प्रस्तावित कानून-ड्राफ्ट - हिन्दू सम्प्रदायों को सिख धर्म की तरह सशक्त बना सकते हैं

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kmoksha
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प्रस्तावित कानून-ड्राफ्ट - हिन्दू सम्प्रदायों को सिख धर्म की तरह सशक्त बना सकते हैं

Post by kmoksha » Thu Oct 16, 2014 4:54 pm

chap-1. सारांश

300 ई. पू. से हिंदूवाद का विस्तार थम गया, तथा 700 ई. से इसका लगातार सिमटना आरम्भ हो गया। 300 ई. पू. में हिंदूवाद का प्रसार अफगानिस्तान से लेकर फिलीपींस तक था। 1600 ई. तक आते आते लगभग 35% जनसँख्या तथा 50% भूमि दूसरे धर्मों के अधीन चली गयी।

सिखों तथा मराठा ने इस क्षति को काफी हद तक रोका तथा बहुत सारी भूमि पुनः प्राप्त कर ली। किन्तु लोगों को फिर से जोड़ नहीं सके। इनकी यह पुनर्विजय स्पेन के धार्मिक पुनर्विजय (जिसमें पहले ईसाई बहुल रहे स्पेन ने अपनी खोई हुई धार्मिक स्वतंत्रता को मुस्लिमों के हाथों से दोबारा प्राप्त कर ली), की तुलना में काफी कमजोर रही। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि यह इतना कमजोर क्यों रहा? फिर 1947 ई. में हिंदुओं ने अपनी भूमि का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के रूप में गवाँ दिया, तथा आगे चलकर इसी का एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेश बना। 1947 से लेकर अब तक उत्तर- पूर्व तथा कश्मीर का लगभग आधा हिस्सा हम गँवा चुके हैं।

1700 ई. से लेकर अब तक के समयांतराल में हिन्दुत्व की पकड़ लोगों पर कमजोर होती जा रही है और इसका स्थान ईसाइयत लेती जा रही है। पिछले 20 वर्षों में भी मिशनरियों द्वारा हिन्दुत्व को नुकसान पहुँचाने की प्रवृत्ति तथा गति तेजी से बढ़ी है।

किसी अन्य लेख में मैं इस विषय पर भी लिखूंगा कि विगत में हिन्दुत्व को यह क्षति क्यों हुई। यह लेख वर्त्तमान एवं भविष्य के लिए सम्भावित दिशानिर्देशों के सम्बन्ध में है।

मेरे विचार से वर्त्तमान में मिशनरियों के हाथों हिन्दुत्व की लगातार होती क्षति के निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:

1. मिशनरियों का गठबंधन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों के साथ है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास भारत की तुलना में उन्नत तकनीक तथा सेना है। उनके पास उन्नत तकनीक होने का कारण है पश्चिमी देशों में राइट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख, राइट टू रिकॉल न्यायाधीश, ज्यूरी सिस्टम (न्यायपीठ प्रणाली), संपत्ति कर, उत्तराधिकार कर आदि का होना।

2. चर्चों में नियुक्तियां तथा धन वितरण मंदिरों की तुलना में ज्यादा अच्छे व सुव्यवस्थित है। इसके अच्छे होने के निम्नलिखित कारण हैं:

(2a) चर्च ऑफ़ इंग्लैण्ड नामक एक प्रोटेस्टेंट संप्रदाय में चर्च के पैसों के वितरण सम्बन्धी सभी निर्णय पादरी (priests) लेते हैं। किन्तु ये पादरी प्र. मं./ सांसदों के द्वारा नियुक्त होते हैं तथा कोई भी आपराधिक कार्य करने पर ज्यूरी के नियंत्रण में होते है। साथ हीं चर्च की संपत्ति पर उनका कोई उत्तराधिकार नही होता।

(2b) अन्य सभी प्रोटेस्टेंट सम्प्रदायों में स्थानीय बुजुर्गों द्वारा पादरी नियुक्त किया जाता है। अतः चर्च के पैसों पर उत्तराधिकार लागू नही होता। और इसलिए प्रोटेस्टेंट चर्चों में धन संग्रह की प्रवृत्ति नही पाई जाती। तथा वे इस धन को समुदाय के निर्माण व विस्तार में उपयोग करते हैं।

(2c) कैथोलिकों में चर्च के पैसों के वितरण सम्बन्धी निर्णय पादरी द्वारा लिए जाते हैं, जो कि पोप के अधीन होता है। अगले पोप की नियुक्ति 100- 200 सर्वाधिक पुराने पादरी जिन्हें कार्डिनल्स कहते हैं, मिलकर करते हैं। उत्तराधिकार यहाँ भी नही होता, चूँकि पादरी अविवाहित रहते हैं तथा उनमें गुरु प्रथा भी नही होती। अर्थात वर्त्तमान पादरी द्वारा अगले पादरी कि नियुक्ति नही की जाती। अतः कैथोलिक चर्चों में भी संपत्ति संग्रह नही होता, तथा ये भी दान में मिले पैसों को समुदाय के निर्माण व विस्तार पर खर्च करते हैं।

3. हिन्दू मंदिरों में धन के वितरण सम्बन्धी निर्णय मंदिर प्रमुख (ट्रस्टी) या संप्रदाय प्रमुख (गुरु) द्वारा लिए जाते हैं, जिनका स्वामित्व उस मंदिर पर होता है। ट्रस्टी का पद उत्तराधिकार तथा गुरु प्रथा द्वारा हस्तांतरित होता है। अर्थात वर्त्तमान गुरु हीं अगला गुरु नियुक्त करता है। अतः यहाँ संपत्ति- संग्रह की प्रवृत्ति होती है, तथा इसका उपयोग तड़क- भड़क, दिखावे एवं ऐशो आराम में भी होता है।

इसका समाधान सिख गुरुओं ने, खासकर 10 वें सिख गुरु श्री गोविन्द सिंह जी ने ढूंढ निकाला था, तथा इसे सभी सिख गुरुद्वारों में लागू किया था। किन्तु दुर्भाग्यवश यह कभी भारत के सभी मंदिरों में लागू नही हो सका। मेरे विचार से हमें चाहिए कि इसे आज हीं लागू करें। समस्या का समाधान यह है कि सभी हिन्दू मंदिरों के लिए सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी जैसा कानून बनाया जाये। तथा इस प्रकार इस कानून के माध्यम से हम मंदिरों में संपत्ति संग्रह को कम करके हिंदूवाद का पतन रोक सकते हैं। वर्त्तमान में फैक्टर १ के समाधान हेतु हमें भारत में राइट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम, संपत्ति कर, उत्तराधिकार कर आदि जैसे कानूनों की आवश्यकता है। इनका वर्णन मैंने http://www.prajaadhinbharat.wordpress.com में किया है। यहाँ पर यह नोट लिखने का मेरा उद्देश्य यह बताना है कि कैसे हिन्दू मंदिरों की व्यवस्था सशक्त बनाई जा सकती है।

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Chap-2 : विभिन्न धार्मिक विश्वास तथा उनसे जुड़े धार्मिक संस्थानो में नियुक्तियां एवं प्रशासनधर्म के दो पहलू होते हैं:

(1) ईश्वर, आत्मा, आध्यात्म आदि में विश्वास

(2) वह प्रशासन जिसके अधीन धर्मस्थलों के पुजारी या प्रमुख, व्यवस्थापक, तथा सम्पदा होती है।धर्मस्थल के पुजारियों तथा व्यवस्थापकों सम्बन्धी व्यवस्था जिस तरीके से की जाती है उसका सीधा असर उस धर्म विशेष में लोगों की आस्था के ऊपर पड़ता है। प्रत्येक धर्म के अनुयायी भारी मात्रा में सहायता व चंदे की राशि अपने मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि को दान करते हैं। अब मैं विभिन्न धर्मों द्वारा निम्नलिखित मुद्दों पर निर्णय लेने के तरीकों की तुलना करके उनमें अंतर देखना चाहूंगा-

(2a) धर्मस्थल के पैसों का उपयोग कहाँ किया जाये इसका निर्णय कौन करता है।

(2b) धर्माचार्यों एवं व्यवस्थापकों की नियुक्ति कौन करता है तथा किस प्रक्रिया के द्वारा एक पीढ़ी दुसरी पीढ़ी के पुजारी अथवा धर्माचार्य को नियुक्त करती है।

(2c) धर्मस्थल का धन किस प्रकार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता है।

(2d) जो तरीका (a) से लेकर (c) तक के लिए प्रयोग किया जाता है उसी से तय होता है कि "धर्माचार्य जो सन्देश समुदाय के सदस्यों को देते हैं उनपर अनुयायियों का कितना नियंत्रण होगा।"

अतः धर्मस्थलों की संपत्ति की व्यवस्था प्राचीन हिन्दू धर्म, वर्त्तमान हिन्दू धर्म, चर्च, मस्जिद, गुरुद्वारों आदि में किस प्रकार होती रही है?

2.1. प्राचीन हिंदूवाद के अंतर्गत "मंदिरों" का प्रशासन-

रामायण एवं महाभारत में एक भी ऐसे मंदिर की चर्चा नही मिलती जिसके पास प्रचुर मात्रा में स्वर्ण और धन हो!! इस सम्बन्ध में जो कुछ भी हमें पढ़ने को मिलता है उससे पता चलता है कि उस काल में मंदिरों की जगह आश्रम होते थे। इन आश्रमों को दान के रूप में मिले धन का उपयोग गायों की सेवा, सबको गायों का दूध उपलब्ध कराने, अमीर- गरीब का भेद किये बिना सभी बच्चों को गणित, विज्ञान, कानून, भाषा तथा अस्त्र- शस्त्र की शिक्षा देने, गरीबों को औषधि उपलब्ध कराने तथा उनके कल्याण हेतु किया जाता था। इसलिए आश्रम- प्रमुख को "पुरोहित" कहते थे जो दो शब्दों से बना है- "पर" तथा "हित", अर्थात ऐसा व्यक्ति जो दुसरो के कल्याण की चिंता करे। आश्रम उत्तराधिकार द्वारा नही चलता था। तथा जरूरी नही था कि आश्रम- प्रमुख के पुत्र को हीं आश्रम की बागडोर हस्तांतरित हो जाये। यह एक संत से दूसरे ऐसे संत को हस्तांतरित होता था जो कि समाज में सम्मानित होते थे। इनकी कार्यावधि भी स्थायी नही होती थी। संत हमेशा यात्रा पर भी जाते रहते थे। यह व्यवस्था अब बहुत ही कम हिन्दू समुदायों में शेष रह गई है।

अनुयायियों का कितना नियंत्रण मंदिरों तथा उनके संदेशों पर था: अनुयायियों का कितना नियंत्रण उस समय मंदिरों पर था यह स्पष्ट नही हो पाया है, चूँकि अब यह विगत की बात हो गयी है तथा इसके लिए लिखित सामग्री भी बहुत उपलब्ध नही है।

2.2. वर्त्तमान हिन्दू मंदिरों का प्रशासन-

वर्त्तमान में मंदिर सामुदायिक सम्पदा नहीं हैं। इनका स्वामित्व कानूनी रूप से किसी ट्रस्ट के पास होता है, बिलकुल उसी तरह जैसे उनकी निजी संपत्ति हो। मंदिरों के मालिक उर्फ़ ट्रस्टी हीं निर्णय करते हैं कि मंदिर का धन कहाँ और किस काम में खर्च किया जाये। ट्रस्टी का कार्यकाल प्रायः आजीवन होता है, तथा वर्त्तमान ट्रस्टी हीं अगले ट्रस्टियों की नियुक्ति भी करते हैं, जो एक प्रकार से मालिक भी कहे जा सकते हैं। इस प्रकार मंदिरों का स्वामित्व एक ट्रस्टी से दुसरे ट्रस्टी को हस्तांतरित होता है, जो कि वर्त्तमान ट्रस्टियों द्वारा हीं नियुक्त किये जाते हैं न कि किसी चुनाव प्रक्रिया द्वारा। साथ हीं बहुत से प्रमुख व्यक्ति स्वयं को आजीवन के लिए स्वयं- नियुक्त कर लेते हैं। अतः व्यवस्था का लम्बे समय तक अयोग्य व्यक्ति के हाथ में रहना सम्भव है। वर्त्तमान मालिक की मृत्यु हो जाने पर नए मालिक की नियुक्ति उत्तराधिकार द्वारा होती है। अर्थात मंदिर के मालिक का पुत्र या कोई भांजा आदि हीं उसके बाद मंदिर का मालिक बनता है। कुछ समुदायों में मंदिर के मालिक को अविवाहित रहना पड़ता है, वहाँ गुरु प्रथा है। यानी जाने से पहले मंदिर प्रमुख अपने किसी प्रिय शिष्य को अगला गुरु नियुक्त कर के जाते हैं। पुजारी का स्थानांतरण भी हो सकता है। किन्तु यदि समुदाय बहुत छोटा है तो ज्यादा स्थानांतरण सम्भव नही।वर्त्तमान हिन्दू मंदिरों पर अनुयायियों का नियंत्रण: अनुयायी, जिनमें मध्य संभ्रांत वर्ग शामिल है, उनका मंदिर के पुजारी पर अथवा उसके द्वारा समाज को दिए जाने वाले संदेशों पर या मंदिर के धन का उपयोग सम्बन्धी व्यवस्थापकों द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों पर कोई नियंत्रण नही होता। सत्ताधारी उच्च वर्ग का काफी हस्तक्षेप हो सकता है, चूँकि पुजारी काफी हद तक ट्रस्टियों पर निर्भर होता है। किन्तु ऐसे मंदिरों में जहाँ पुजारी स्वयं हीं मालिक भी है, वहाँ सत्ताधारी उच्च वर्ग का भी हस्तक्षेप न के बराबर होता है।

2.3. मस्जिद का प्रशासन-

मस्जिद का स्वामित्व ट्रस्ट के पास होता है जिसे "वक्फ' कहते हैं। ट्रस्ट के सदस्य समुदाय के बुजुर्ग, सम्मानित व्यवसायी, योद्धा तथा समाज में अन्य सम्मानित व्यक्ति होते हैं। इनकी नियुक्ति खुली सार्वजनिक बैठक में स्थानीय मुस्लिम बुजुर्गों की आमराय से होती है। प्रत्येक स्थानीय मुस्लिम को इस बैठक में शामिल होने को कहा जाता है। कोई औपचारिक मतदान नही होता, किन्तु अस्पष्ट तौर पर मतदान होता भी है। ट्रस्टी आजीवन के लिए नही होते बल्कि प्रत्येक 4- 5 वर्ष में सेवानिवृत्त हो जाते हैं। फिर से नियुक्ति की प्रक्रिया दोहराई जाती है, जिसमें वे पुनःनियुक्त हो सकते हैं। ट्रस्टी के पुत्र की नियुक्ति की कोई गारंटी नही होती। तथा एक ही परिवार से कई सदस्यों की नियुक्ति आमतौर पर नही की जाती है। वस्तुतः कुछ ट्रस्टों की तो परंपरा हीं होती है कि एक समय में एक परिवार का केवल एक हीं सदस्य ट्रस्टी बन सकता है। मुल्ला एक वेतनभोगी कर्मचारी होता है जिसकी नियुक्ति ट्रस्टी करते हैं। मस्जिद की संपत्ति तथा दान में मिले धन को कैसे उपयोग किया जायेगा इसका निर्णय ट्रस्टी लेते हैं। कोई उत्तराधिकार या गुरुप्रथा नही होती। मुल्ला के पास किसी मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय से डिग्री होनी चाहिए जैसे देवबधी आदि से। एक मस्जिद से दुसरी मस्जिद में मुल्ला का स्थानांतरण हो सकता है। कुछ क्षेत्रों में मुल्ला अर्ध- न्यायिक कर्तव्य भी निभाता है, तथा विवादों का निबटारा करता है , साथ हीं सजा भी देता है। इसे हीं कभी कभी शरीयत न्यायालय कहते हैं। इस प्रकार की सभी न्यायिक एवं व्यवस्था सम्बन्धी निर्णय आम सभा करके ली जाती है।

अनुयायियों का मस्जिद पर नियंत्रण: गरीब अनुयायियों का तो कोई हस्तक्षेप मस्जिद की व्यवस्था या धन पर नही होता। किन्तु मध्य संभ्रांत वर्ग ट्रस्टी बन सकते हैं। अतः मौलवी पर, उसके द्वारा समाज को दिए जाने वाले संदेशों पर तथा मस्जिद के धन का उपयोग सम्बन्धी निर्णयों पर मध्य संभ्रांत वर्ग का नियंत्रण होता है।

2.4. कैथोलिक चर्च का प्रशासन-

(देखें: http://bible.ca/catholic-church-hierarc ... zation.htm )

कैथोलिक धर्माचार्य या पादरी आजीवन अविवाहित रहते हैं तथा अपने नाम से संपत्ति भी नही रख सकते। जो भी संपत्ति या दान चर्च को मिलता है वह वेटिकन का हो जाता है। कैथोलिक पद- स्तर इस प्रकार है- पोप > बिशप > स्थानीय पादरी। दुनियाभर में लगभग 1 करोड़ कैथोलिक हैं, जिनकी सेवा के लिए लगभग 3000 बिशप तथा 2 लाख स्थानीय पादरी है। कुछ बिशप को कार्डिनल या आर्कबिशप की उपाधि मिली होती है। यह उपाधि पोप द्वारा वर्त्तमान कार्डिनलों तथा आर्कबिशापों की राय लेने के बाद दी जाती है। सबसे महत्वपूर्ण चीज यह देखी जाती है कि कितने नये सदस्य इन्होने जोड़े तथा बनाये रखे। वर्त्तमान में लगभग 120 कार्डिनल हैं। कार्डिनल प्रायः आजीवन सेवा प्रदान करते है। किन्तु प्रायः वे 80 साल की उम्र के बाद उतने सक्रिय नहीं रह जाते। फिर भी उनकी कार्डिनल की उपाधि बनी रहती है। पोप का कार्यकाल भी आजीवन होता है। लेकिन अब धीरे- धीरे पोप के 85 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त होने का चलन आ रहा है। कैथोलिक तथा वर्त्तमान हिन्दू समुदायों में सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि 100- 150 कार्डिनल मिलकर अगले पोप की नियुक्ति करते हैं, तथा यह उत्तराधिकार गुरुप्रथा द्वारा नही होता। अगला पोप कौन होगा इसपर वर्त्तमान सेवानिवृत्त होने जा रहे पोप कोई बयान नही देते या अपनी पसंद नही बताते। चूँकि पादरी हीं विवाह नही करता, अतः इस पूरी पद- श्रंखला में उत्तराधिकार का कोई प्रश्न हीं नही उठता। मान लीजिये पादरी का कोई प्रेम-प्रसंग हो और उसके चलते उसका कोई बच्चा भी हो, तो जरूरी नही कि वह बच्चा भी अविवाहित रहकर पादरी बनना चाहे। पादरी का स्थानांतरण देश के अंदर तथा देश के बाहर भी होना आम बात है। इससे उसे पूरी दुनिया से पहचान बनाने का मौका मिलता है। पादरी यदि किसी पेशे से जुड़ना चाहे तो इसे अच्छा समझा जाता है। उदाहरण के लिए - बहुत से पादरी शिक्षक, चिकित्सक, वकील, सम्पादक तथा यहाँ तक कि निम्न स्तर के समझे जाने वाले काम जैसे बढ़ई का काम भी करते हैं। पादरी को पुलिस या अन्य प्रभुत्त्व मिलने वाले कार्य नही करने होते हैं। किन्तु युद्ध के समय यदि वे सेना में भर्ती होना चाहें तो इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है। लगभग 300 ई. से लेकर अब तक पूरे यूरोप में बड़ी संख्या में पादरियों ने न्यायाधीश के पद पर कार्य किया है। इसमें कमी तब आई जब यूरोप में ज्यूरी सिस्टम आरम्भ हुआ। गरीब रहने की शपथ लेने के कारण पादरी अपने नाम से संपत्ति नही रख सकता। उनके पास अपने नाम से कोई घर, कार, बैंक खाता नही होता। सारा धन चर्च के नाम से रहता है। वे अपनी नौकरी से प्राप्त वेतन भी चर्च में जमा कर देते हैं। तथा वे ऐशो आराम की जिंदगी नही बिताते। अनुयायियों का नियंत्रण: अनुयायी चाहे वे गरीब हों या मध्य संभ्रांत वर्ग या सत्ताधारी उच्च वर्ग, उनका कोई सीधा हस्तक्षेप नही होता। लेकिन इसके बदले पादरी का भी कोई उत्तराधिकार नही होता।

2.5. चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का प्रशासन-

चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का प्रशासन इंग्लैंड की महारानी तथा कैंटबरी के आर्कबिशप के अधीन होता है। सैद्धांतिक रूप से तो प्रधान मंत्री तथा सांसदों का कोई हस्तक्षेप नही होता, किन्तु वास्तव में उनका काफी हस्तक्षेप इस बात पर होता है कि महारानी, आर्कबिशप तथा पादरी किस प्रकार चर्च ऑफ़ इंग्लैंड का प्रशासन चलाएंगे। हालांकि प्रधान मंत्री, सांसद तथा यहाँ तक कि रानी भी दिन प्रतिदिन के मामलों में हस्तक्षेप नही करते। लेकिन दीर्घकालीन नीतियों सम्बन्धी निर्णय अप्रत्यक्ष रूप से इन्हीं पर निर्भर करता है। कैसे?

कैंटरबरी के आर्कबिशप कि नियुक्ति इंग्लैंड की महारानी द्वारा होती है, जिसका सीधा मतलब हुआ कि यह नियुक्ति अप्रत्यक्ष रूप से प्रधान मंत्री द्वारा की जाती है। पादरी की नियुक्ति की अनुशंषा एक बोर्ड द्वारा की जाती है जो कि जिसका गठन आर्कबिशप तथा महारानी (परोक्ष रूप से प्र. मं. एवं सांसदों) द्वारा होता है। तथा सांसदों का निर्वाचन जनता करती है। साथ हीं पादरी यदि कोई आपराधिक कृत्य करता है तो उस पर ज्यूरी द्वारा सुनवाई होती है।

अनुयायियों का नियंत्रण: चर्च के अनुयायी जो कि इंग्लैण्ड की जनता है, उनका नियंत्रण चर्च पर दो तरीके से है- प्रधान मंत्री के माध्यम से तथा ज्यूरी के माध्यम से। इस प्रकार चर्च ऑफ़ इंग्लैंड पूर्णतः लोकतान्त्रिक है। सांसदों के माध्यम से, प्रधान मंत्री के माध्यम से तथा पादरी के चयन की अनुशंषा करने वाले बोर्ड के माध्यम से अनुयायियों का नियंत्रण इस बात पर होता है कि चर्च आम जनता को क्या सन्देश देगा तथा चर्च का धन कैसे खर्च किया जायेगा।

2.6. एपिस्कोपल प्रोटेस्टेंट चर्च का प्रशासन-

इस चर्च का स्वामित्व एक ट्रस्ट के अधीन होता है जिसका गठन एपिस्कोपल (बिशपों के) संभ्रांत वर्ग द्वारा होता है। ट्रस्टी चक्रीय क्रमानुसार बदलते रहते हैं तथा उत्तराधिकार की कोई गारंटी नही होती। पादरी की नियुक्ति ट्रस्टियों द्वारा होती है जो कि संभ्रांत वर्ग से होते हैं। किन्तु पादरी द्वारा कोई भी आपराधिक कृत्य करने पर निर्णय ज्यूरी द्वारा लिया जाता है। ज्यूरी के सदस्य समाज के बीच से हीं यादृच्छिक रूप से चुने जाते हैं। अतः पादरी तथा संभ्रांत वर्ग का ज्यूरी के ऊपर कोई नियंत्रण नही होता।अनुयायियों का नियंत्रण: अनुयायियों का कोई सीधा नियंत्रण चर्च प्रमुखों या व्यवस्थापकों पर नही होता, मात्र ज्यूरी के माध्यम से थोडा नियंत्रण होता है। किन्तु ज्यूरी का चयन पूरे समाज से होता है न कि सिर्फ अनुयायियों के बीच से। तथा ज्यूरी मात्र आपराधिक मामलों में हीं हस्तक्षेप करती है, अन्य मामलों में नहीं। चूँकि संभ्रांत वर्ग ट्रस्टी होते हैं तथा वही पादरी की नियुक्ति करते हैं, अतः अनुयायियों का कोई सीधा हस्तक्षेप पादरी द्वारा दिए जाने वाले 'संदेशों' पर नही होता। किन्तु अनुयायी अपने कदमों की ताकत का इस्तेमाल कर इस चर्च से पलायन कर किसी अन्य चर्च से जुड़ सकते हैं। चर्च तथा पादरी उन्हें जबरन नही रोक सकते, चूँकि ज्यूरी उनके द्वारा बलप्रयोग को आपराधिक कृत्य मानेगी। अतः अनुयायियों को बनाये रखना है तो चर्च के ट्रस्टी एवं पादरी को उनकी बात सुननी हीं होगी।

2.7. अन्य प्रोटेस्टेंट चर्चों का प्रशासन-

चर्च ऑफ़ इंग्लैण्ड को छोड़कर यूरोप एवं अमेरिका के लगभग सभी प्रोटेस्टेंट चर्चों का प्रशासन एपिस्कोपल चर्च की तरह होता है। चर्च एक ट्रस्ट के अधीन होता है जिसके सदस्य समुदाय के संभ्रांत वर्ग के व्यक्ति होते हैं। ट्रस्ट हीं पादरी की नियुक्ति करता है जो कि लोगों को धार्मिक सन्देश तथा आध्यात्मिक परामर्श देता है।

अनुयायियों का नियंत्रण: चूँकि संभ्रांत वर्ग से ही ट्रस्टी नियुक्त होते हैं तथा वही पादरी को नियुक्त करते हैं, अतः पादरी द्वारा दिए जानेवाले धार्मिक संदेशों में अनुयायियों का कोई सीधा हस्तक्षेप नही होता। किन्तु अनुयायी इस चर्च को छोड़कर कोई अन्य चर्च से जुड़ सकते हैं। तथा चर्च एवं ट्रस्ट उन्हें ऐसा करने से रोक नहीं सकते, चूँकि ज्यूरी उन्हें किसी भी प्रकार का बल प्रयोग करने की इजाजत नही देगी। अतः अपने अनुयायियों को बनाये रखने के लिए चर्च ट्रस्टी तथा पादरी को उनकी बात भी सुननी होगी।

2.8. सिख गुरुद्वारा का प्रशासन-

मेरे विचार से सिख गुरुद्वारा प्रशासन हर तरीके से सर्वोत्तम है तथा सर्वाधिक वैदिक प्रकृति का भी प्रतीत होता है। तथा मेरा यह भी मानना है कि सभी हिन्दू मंदिरों को भी अपना प्रशासन इन्हीं के पदचिन्हों पर चलकर सुधारना चाहिए। सिखों के इतने सशक्त होने का एकमात्र कारण उनके द्वारा अपनाया गया गुरुद्वारों के प्रबंध का तरीका रहा है। सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी अधिनियम (SGPC act) के दिशा निर्देशों के अनुसार ही सभी सिख गुरुद्वारों का प्रबंधन होता है। इसका विस्तृत वर्णन मैंने अगले सेक्शन में किया है।

अनुयायियों का नियंत्रण: अनुयायियों द्वारा हीं गुरुद्वारा प्रमुख क़ी नियुक्ति की जाती है, अतः उनका पूर्ण नियंत्रण पूरी व्यवस्था पर होता है।

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Chap-3 : सिख गुरुद्वारा का प्रशासन- सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम

सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम तथा गुरुद्वारों के प्रबंधन सम्बंधी विस्तृत जानकारी पाठक इंटरनेट से अथवा अपने सिख मित्रों से प्राप्त कर सकते हैं, (इसके लिए एक अच्छा लिंक है: en.wikipedia . org / wiki/Akali_movement । यहाँ मैं सिख गुरुद्वारा प्रशासन के सम्बन्ध में संक्षिप्त विवरण दे रहा हूँ।

सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम का संक्षिप्त इतिहास जानना यहाँ वांछित है। सिख गुरुओं ने यह परंपरा बनाई कि गुरुद्वारा प्रमुख न तो वंशानुगत होंगे, और न हीं कुछ खास व्यक्तियों के अल्पमत से नियुक्त किये जायेंगे, बल्कि उनका निर्वाचन सम्बंधित ग्राम अथवा ग्राम समूह के सभी वयस्क सिख मिलकर करेंगे। प्रत्येक सिख को अपना एक वोट देने का अधिकार समान रूप से प्राप्त था, चाहे वह अमीर हो या गरीब, शिक्षित हो या अशिक्षित। इतिहास में काफी लम्बे समय के बाद 'सार्वभौम मताधिकार' का यह प्रथम उदाहरण है। ग्रीस में भी 'सार्वभौम मताधिकार' लागू किया गया था, परन्तु वहाँ गुलामों को मत देने का अधिकार नही दिया गया था। अतः मात्र 20% जनता को हीं मत देने का अधिकार प्राप्त था, चूँकि शेष 80% गुलाम थे। जबकि सिख धर्म में गुलामी की कोई अवधारणा नहीं थी, बल्कि इसे प्रतिबंधित किया गया था। अतः प्रत्येक वयस्क सिख एक मतदाता था। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सार्वभौम मताधिकार को सर्वप्रथम सिख धर्म में ही गुरुद्वारा प्रमुख के निर्वाचन हेतु लागू किया गया।

सिखों के अंतिम गुरु श्री गोविन्द सिंह ने इसे एक औपचारिक परंपरा बना दी। ग्राम गुरुद्वारा से निर्वाचित प्रतिनिधि हीं अन्य उच्च सिख धार्मिक अधिकारियों की नियुक्ति करते थे। इस प्रकार शीर्ष सिख धर्माधिकारी भी अप्रत्यक्ष रूप से सिख जनता द्वारा हीं निर्वाचित होते थे, न कि उनकी नियुक्ति होती थी। आगे चलकर अमृतसर का स्वर्ण मंदिर उच्च सिख धर्माधिकारियों का मुख्य केंद्र बन गया। अतः यह परंपरा आरम्भ हो गयी कि ग्रामीण सिख गुरुद्वारा प्रमुख का निर्वाचन करेंगे, तथा गुरुद्वारा प्रमुख स्वर्ण मंदिर के प्रमुख का निर्वाचन करेंगे। किन्तु स्वर्ण मंदिर के प्रमुख का निर्वाचन पूर्णतः एक औपचारिक रूप से नियमबद्ध प्रक्रिया नही थी।

निर्वाचन प्रणाली ने सिखों को मुगलों तथा अफगानों की तुलना में अत्यधिक शक्तिशाली बना दिया। किन्तु सिखों की शक्ति अंगेजों की तुलना में 1/10 वाँ भाग भी नहीं हो सकी। ऐसा क्यों? क्योंकि ब्रिटेन में पादरी की नियुक्ति प्रधान मंत्री तथा सांसदों द्वारा गठित बोर्ड करता था, प्रधान मंत्री का निर्वाचन सांसद करते थे, तथा सांसदों का निर्वाचन लगभग 5% जनता द्वारा किया जाता था। साथ हीं ज्यूरी सिस्टम 100% वयस्क जनसँख्या का प्रतिनिधित्व करता था। जबकि सिख धर्म में हालाँकि गुरुद्वारा प्रमुख का तो निर्वाचन होता था किन्तु राजा निर्वाचित न होकर वंशानुगत या कुछ खास लोगों के अल्पमत से हीं चुना जाता था। सिख धर्म में राजा के पद के लिए निर्वाचन की प्रक्रिया को लागू नही किया जा सका। क्यों? क्योंकि राज्य प्रमुख का निर्वाचन बिना ज्यूरी प्रणाली एवं बिना राइट टू रिकॉल के होने से जनतंत्रात्मक परिस्थितियों से पलायन और आगे चलकर जिम्मेदारियों से पलायन को बढ़ावा मिलता है। अंग्रेजों ने आध्यात्मिक जीवन के साथ- साथ सांसारिक जीवन में भी लोकतान्त्रिक प्रणाली लागू की। अर्थात अंग्रेज लोकतान्त्रिक परम्पराओं का पालन करते थे।

1860 के दशक के बाद निर्वाचन प्रणाली में कुछ कमियां आयीं। यद्दपि स्थानीय गुरुद्वारा प्रमुख निर्वाचित होते थे, तथापि उच्च धर्माधिकारियों की नियुक्ति संभ्रांत वर्ग द्वारा होने लगी। सिख संभ्रांत वर्ग को अंग्रेजों द्वारा ठेके प्राप्त होते थे, और इसलिए वे अंग्रेजों के प्रभाव में थे। यहाँ तक कि अंग्रेजों ने स्वर्ण मंदिर के महंत के तौर पर कुछ ऐसे हिन्दूओं को भी नियुक्त कर दिया था जो सिख नही थे। इस प्रकार स्वर्ण मंदिर के उच्च धर्माधिकारी अंग्रेजों के समर्थक थे। स्थानीय सिख गुरुद्वारा प्रमुख निर्वाचित होते थे, इसलिए उनमें भारत समर्थक तथा ब्रिटिश विरोधी प्रवृत्ति दिखती थी। अतः स्वर्ण मंदिर के उच्च धर्माधिकारियों तथा स्थानीय गुरुद्वारा प्रमुखों का आपस में हीं टकराव बढ़ने लगा। तथा यह टकराव तब गम्भीर रूप से सामने आया जब जलियांवाला बाग़ नरसंहार के बाद उच्च सिख धर्माधिकारियों ने जनरल डायर को सम्मानित किया। उनके इस निर्णय का बड़े पैमाने पर आलोचना एवं विरोध गुरुद्वारा प्रमुखों तथा सम्पूर्ण सिख समुदाय ने किया। उच्च धर्माधिकारियों ने यह निर्णय अंग्रेजों तथा कुछ मुट्ठीभर सिख- हिन्दू संभ्रांत व्यक्तियों, जिन्हे अंग्रेजों से ठेके प्राप्त होते थे, के प्रभाव में आकर लिया था। यह स्पष्ट है कि जालियांवाला बाग़ नरसंहार के बाद जनरल डायर की गम्भीर आलोचना हुई, जिसके कारण वह भारत में कुछ सम्मान प्राप्त करना चाहता था। अतः उसने सिख- हिन्दू संभ्रांत वर्ग को प्रभावित किया ताकि वे स्वर्ण मंदिर के महंतों से उसे सम्मानित करने को कहें। तथा सचमुच स्वर्ण मंदिर के महंतों ने जनरल डायर को सम्मानित किया। सिख छात्र, स्थानीय गुरुद्वारा प्रबंधक तथा लगभग सम्पूर्ण सिख समुदाय ने इन महंतों को निष्कासित करने की मांग की।

उच्च धर्माधिकारियों के निर्वाचन की प्रणाली को पुनः लागू करने की मांग सिख समुदाय में जोर पकड़ने लगी। इस संवेगपूर्ण मांग के काफी सशक्तता से उभरने के कारण अंग्रेजों ने सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम (SGPC Act) लागू किया, जिसके द्वारा गुरुद्वारों में पूर्ण लोकतान्त्रिक व्यवस्था आई। इस अधिनियम के अनुसार सिखों का अपना एक अलग चुनाव आयोग होता है। प्रत्येक वयस्क सिख एक पंजीकृत मतदाता होता है। कुछ वर्षों के अंतराल पर चुनाव कराये जाते हैं, जिनमें सिख मतदाता स्थानीय गुरूद्वारे के समिति सदस्यों का निर्वाचन करते हैं। स्थानीय समिति सदस्य राष्ट्रीय स्तर पर समिति सदस्यों, अकाल तख़्त के प्रमुख आदि को निर्वाचित करते हैं। समिति के सदस्य गुरुद्वारा प्रमुख, रागी आदि की नियुक्ति करते हैं। पुनः अगले समिति सदस्य भी निर्वाचित होते हैं। इनमें से किसी का कार्यकाल आजीवन नही होता, तथा एक हीं व्यक्ति के बार बार निर्वाचन को भी तरजीह नही दी जाती। साथ हीं नए सदस्य ज्यादातर पूर्व सदस्यों के रिश्तेदार नही होते, जब तक कि इनका स्वयं का समाज में उच्च सम्मानित स्थान न हो। अतः गुरुद्वारा प्रमुख का कार्यकाल आजीवन नही होता, तथा इनमें उत्तराधिकार नही पाया जाता।

इस प्रकार यह हिन्दू मंदिरों से बिलकुल विपरीत है, जहाँ कि उत्तराधिकार एवं आजीवन कार्यकाल एक नियम बन चुका है। चूँकि गुरुद्वारा में आजीवन कार्यकाल तथा उत्तराधिकार नही होता, अतः इनके ट्रस्टियों एवं व्यवस्थापकों में दान में मिले धन की जमाखोरी की प्रवृत्ति नही पाई जाती। अतः जो भी दान आता है, वो सब वे सामुदायिक कल्याण के कामों जैसे गरीबों के लिए भोजन व औषधि, सबके लिए शिक्षा, हथियार प्रयोग आदि में खर्च होता है।

गुरुद्वारा प्रबंधक का निर्वाचन होने तथा उनके कार्यकाल के आजीवन नही होने की प्रणाली ने सिख धर्म को इतना सशक्त बना दिया कि वे मुगलों, अफगानों आदि को रोक सके। लेकिन राजनीति में सिख इस निर्वाचन प्रणाली को लागू नही कर पाये। जबकि अंग्रेजों ने इसे अपने यहाँ राजनीति में भी लागू किया। साथ हीं चर्च ऑफ़ इंग्लैण्ड के माध्यम से चर्चों में 'लोकप्रिय मत का अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व' को भी लागू किया था । अतः ब्रिटिश सिखों की तुलना में अधिक शक्तिशाली थे, और इसलिए वे सिखों को पराजित कर पाये।

हिन्दू मंदिरों ने मंदिरों की व्यवस्था के लिए सिख मॉडल क्यों नही अपनाया?

सिखों के विश्वास तथा मंदिरों के प्रबंधन के तरीके आध्यात्मिक थे। मंदिरों के प्रबंधन के तरीके हिन्दुओं को ऐसे ढंग से बताये जा सकते थे जो उनके द्वारा स्वीकार्य हो। किन्तु कई आध्यात्मिक विश्वास, जैसे मूर्ति पूजा को महत्व नही देना, अधिकांश हिंदुओं के लिए स्वीकार्य नही थे। अतः यहाँ मैं यह कहना चाहूंगा कि यदि (1) हिंदुओं के सामने सिखों के मंदिर व्यवस्था के अच्छे तरीकों का वर्णन किया जाये, (2) तथा यदि उन्हें मंदिर व्यवस्था के ये अच्छे तरीके अपनाने को कहा जाये (3) साथ हीं उन्हें अपने धार्मिक विश्वासों तथा रीति रिवाजों को बदलने के लिए नही कहा जाये तो सम्भव है कि ये मंदिर व्यवस्था सम्बन्धी अच्छे तरीके हिंदुओं के लिए भी स्वीकार्य बन जाएँ।

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Chap 4- किस प्रकार आजीवन कार्यकाल एवं उत्तराधिकार से मंदिरों में जमाखोरी को बढ़ावा मिलता है

पाठक मुझसे असहमत होकर यह कह सकते हैं कि यदि मंदिरों में आजीवन कार्यकाल तथा उत्तराधिकार प्रणाली है तो इसमें बुराई क्या है? तथा गुरू प्रथा में गलत क्या है, जिसके अंतर्गत वर्त्तमान गुरू हीं अपने शिष्यों में से किसी एक को अगला गुरू चुनते हैं? यह एक वैध प्रश्न है। आइये, हम दो परिदृश्यों की तुलना करके देखें- पहला, जिसमें मंदिर प्रमुख A का कार्यकाल मात्र 2 वर्षों का है, तथा दूसरा परिदृश्य जिसमें मंदिर प्रमुख B का कार्यकाल आजीवन का है। मान लीजिये प्रमुख A तथा प्रमुख B दोनों हीं अलग- अलग मामलों में 1- 1 करोड़ रूपये प्राप्त करते हैं। ऐसी स्थिति में B, जिसका कार्यकाल आजीवन का है, उस 1 करोड़ रूपये को खर्च करने की बजाय लम्बे समय तक अपने पास रखना चाहेगा। जबकि A का कार्यकाल चूँकि कुछ वर्षों का निश्चित है, अतः बदतर स्थिति में हीं वह इसका कुछ भाग अपनी जेब में डालने की कोशिश कर सकता है। किन्तु एक सीमा से अधिक यह भी सम्भव नहीं होगा। अतः A इस पैसे को यथासम्भव सामुदायिक कार्यों में हीं लगाएगा, ताकि उसे यश मिले तथा उसके पुनर्निर्वाचन की सम्भावना भी बढ़ जाये। इस प्रकार आजीवन कार्यकाल से खर्च की इच्छा घटती है, तथा जमाखोरी की इच्छा बढ़ती है। जबकि कुछ वर्षों के निश्चित कार्यकाल से जमाखोरी की प्रवृति घटती है, तथा सामुदायिक कार्यों में खर्च करने की इच्छा बढ़ती है।

उत्तराधिकार तथा आजीवन कार्यकाल दोनों हीं साथ- साथ पाये जाते हैं। प्रत्येक ऐसी संस्था जिसमें आजीवन कार्यकाल होता है, वहाँ उत्तराधिकार भी होता है। इसी प्रकार उत्तराधिकार प्रथा वहीँ होती है जहाँ कि आजीवन कार्यकाल भी होता है। निश्चित समय का कार्यकाल होने से आजीवन कार्यकाल तथा गुरु प्रथा दोनों हीं स्वतः- रद्द हो जाते हैं।

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Chap- 5. किस प्रकार मंदिरों में आजीवन कार्यकाल एवं उत्तराधिकार से सामुदायिक प्रतिरक्षा कमजोर पड़ती है?

अध्याय 4 में दिए गये उदाहरण में प्रमुख B अपने उत्तराधिकारी के लिए धन संग्रह करना चाहेगा, तथा उत्तराधिकारी भी उसपर यथासम्भव कम खर्च करने के लिए दबाव बनाएंगे। अतः जमाखोरी आगे बढ़ते हीं जायेगी, सामुदायिक कार्यों में गिरावट आएगी, तथा समस्या बद से बदतर होती जायेगी। सामुदायिक कार्यों में धन खर्च करने की जगह संग्रह करने की प्रवृत्ति से समुदाय की प्रतिरक्षा क्षमता कमजोर पड़ती है। उदाहरण के लिए मान लीजिये दो समुदाय A तथा B हैं। समुदाय A में मंदिर प्रमुख का कार्यकाल निश्चित है, तथा उत्तराधिकार की जगह उसका निर्वाचन अनुयायियों द्वारा किया जाता है। समुदाय B में मंदिर प्रमुख का कार्यकाल आजीवन का है, तथा उत्तराधिकार प्रथा भी है। यदि समुदाय A पर कोई बाह्य आक्रमण होता है, जिसमें समुदाय के 1000 में से लगभग 100 सदस्यों ने युद्ध में जाने का निर्णय लिया। मान लीजिये युद्ध में उनमें से 10 मारे गये तथा 10 बुरी तरह घायल हो गये। अब यदि घायलों तथा मारे गये व्यक्तियों के परिजनों को मंदिर कोई सहायता नही देते, तो अगली बार हमले में बहुत कम व्यक्ति लड़ने जायेंगे। फलस्वरूप समुदाय का नियंत्रण आक्रमणकारियों के हाथों में चला जायेगा। यदि समुदाय B के साथ भी समान परिस्थिति की कल्पना करें तो चूँकि यहाँ धन संग्रह नहीं होता, अतः मंदिर प्रमुख घायलों एवं मृत तथा घायल व्यक्तियों के परिजनों की सहायता करेंगे। अतः अगली बार भी युद्ध छिड़ने पर बड़ी संख्या में लोग अपनी जान जोखिम में डाल कर लड़ने जायेंगे। इस प्रकार निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती हैं-

1. यदि मंदिर में धन संग्रह की प्रवृत्ति है तो

2. मंदिर की तरफ से घायलों तथा मृतकों के परिजनों को मिलने वाली सहायता में कमी आती है।

3. अतः समुदाय की सुरक्षा के लिए लड़ने की इच्छा रखने वाले सदस्यों की संख्या में कमी आती है।

4. फलस्वरूप समुदाय की पराजय बाह्य आक्रमणकारियों के हाथों होती है।

यही कारण है कि गैर सिख हिन्दू पराजित हुए जबकि सिखों ने युद्धों में कड़ी टक्कर दी। गैर सिख हिन्दूओं में मंदिर प्रमुख आजीवन तथा उत्तराधिकार द्वारा नियुक्त होते हैं, अतः उनमें धन संग्रह की प्रवृत्ति होती है, तथा वे घायलों व मृतकों के परिवार वालों की अत्यल्प मदद कर पाते हैं या करते हीं नही। जबकि सिख गुरुद्वारा प्रबंधक का निर्वाचन निश्चित समय के कार्यकाल के लिए होता है, अतः उनमें धन संग्रह की प्रवृत्ति नही पाई जाती, इसलिए वे घायलों व मृतकों के परिजनों की मदद करते हैं। अतः सिखों में लड़ने का जोश बना रहता है, तथा सतत बढ़ता हीं जाता है। और इस कारण सिख स्वयं को तथा हिंदुओं को मुगलों व अफगानों के हिंसक आक्रमणों में सुरक्षा दे पाये।

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Chap- 6. किस प्रकार आर्यसमाज द्वारा अपेक्षाकृत अच्छी व्यवस्था देने के बावजूद विकास अवरूद्ध हो गया?

आर्य समाज में मंदिर के ट्रस्टियों का कार्यकाल आजीवन नहीं होता। उनका कार्यकाल कुछ वर्षों का होता है और उस अवधि के पूरा होने पर उनकी जगह नए ट्रस्टी आ जाते हैं जो कि जरूरी नही कि उनके नजदीकी रिश्तेदार हों। ये ट्रस्टी सम्मानित व्यवसायी, उद्द्योगपति तथा बुद्धिजीवि होते हैं। जानेवाले ट्रस्टी हीं नए ट्रस्टी का निर्णय करते हैं। यह ठीक उसी प्रकार का होता है जिस प्रकार से प्रोटेस्टेंट चर्चों की व्यवस्था होती है। मेरे विचार से मंदिर प्रमुख की नियुक्ति के लिए सिखों द्वारा अपनायी गयी पध्धति अपेक्षाकृत अधिक उत्तम है, किन्तु आर्य समाज का तरीका भी उत्तराधिकार एवं आजीवन कार्यकाल से तो कई गुना कम बुरा है। कुछ समय के अंतराल पर चक्रीय क्रम से ट्रस्टियों के बदलते रहने से यहाँ धन संग्रह की प्रवृत्ति नहीं होती , अतः दान में मिले धन का उपयोग सामुदायिक सशक्तिकरण सम्बन्धी कार्यों में होता है।

आर्य समाज द्वारा अपनायी गयी प्रणाली का अनुकरण सभी मंदिरों द्वारा किया जा सकता था। किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं हो सका। क्योंकि मंदिर प्रबंधन की यह पद्धति धार्मिक विश्वास के साथ अत्यधिक अंतर्संबंधित हो गयी थी। यदि अन्य हिन्दूओं के समक्ष मात्र मंदिर प्रबंधन का यह तरीका रखा जाता तो वे इसे स्वीकार कर सकते थे। किन्तु ऐसा लगता है कि इस पद्धति को धार्मिक विश्वास के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया गया। तथा इनके कुछ विश्वास अन्य हिन्दूओं के लिए स्वीकार्य नहीं थे, जैसे- मूर्तिपूजा का विरोध। अतः इनकी मंदिर व्यवस्था की प्रणाली भी नहीं अपनायी गयी।

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Chap- 7. मंदिरों की संपत्ति पर मिशनरियों के कब्जे में उत्तराधिकार प्रथा किस प्रकार सहायक हुई?

मंदिरों में उत्तराधिकार ने एक दीर्घस्थायी समस्या को जन्म दिया। मैं यहाँ एक मंदिर का उदाहरण बिना उसका नाम लिए देना चाहूंगा। यह मंदिर लगभग 1000 वर्ष पूर्व निर्मित हुआ था, तथा उसका एक महंत था। उसके 5 बेटे थे जो कि उसके बाद महंत बने। उनमें से प्रत्येक कुछ समय के अंतराल पर चक्रीय क्रम से महंत की गद्दी पर बैठता था। फिर उन 5 में से प्रत्येक को 2 या 3 पुत्र हुए, यानी कुल मिलकर लगभग 12 पुत्र। उन पाँचों के मृत्योपरांत उनके ये 12 पुत्र, यानी प्रथम महंत के प्रपौत्र उत्तराधिकारी बने। अब ये 12 भी बारी बारी से कुछ समय के अंतराल पर चक्रीय क्रम से महंत की गद्दी पर बैठते थे। किन्तु उनकी भागीदारी समान नहीं रहती हो सकती थी। जैसे- यदि A के 2 पुत्र A1 तथा A2 थे एवं B के 4 पुत्र B1, B2, B3 तथा B4 थे। ऐसी स्थिति में A1 या A2 की भागीदारी B1, B2, B3 या B4 की तुलना में ठीक दोगुनी हो जायेगी। अक्सर ऐसा भी होता है कि किसी महंत का कोई पुत्र न हो और उसकी मृत्यु हो जाये। अब ऐसे में यदि उसने पुत्र गोद लिया है या पुत्र का जन्म उसकी मृत्यु के उपरान्त हुआ हो तो यह ऐसे में वह महंत बनेगा या नहीं इस पर कानूनी विवाद चल सकता है। साथ हीं भागीदारी पर भी विवाद हो सकता है। अतः इस तरह से तो आज से लगभग 20- 30 पीढ़ियों के बाद मंदिर के लगभग 500 महंत हो सकते हैं। साथ हीं उत्तराधिकार सम्बन्धी 50 से अधिक अनसुलझे मुकदमे भी न्यायालय में चल रहे होंगे। इन मुकदमों का बहाना बनाकर भारत सरकार मंदिरों का अधिग्रहण कर सकती है। चूँकि भारत के प्रमुख राजनीतिक दल मिशनरी के दलाल हैं, अतः मंदिरों की दान द्वारा प्राप्त आय मिशनरियों द्वारा चलायी जा रही धर्मार्थ संस्थाओं के पास चली जाती हैं। इस प्रकार मिशनरियों को मंदिरों से पैसे प्राप्त होते हैं जिसका उपयोग वे हिन्दूओं का धर्मपरिवर्तन कर उन्हें क्रिश्चियन बनाने में करते हैं।

इस प्रकार मंदिरों में उत्तराधिकार के चलते दसियों विवाद खड़े होते हैं जिससे कि सरकार द्वारा मंदिरों की संपत्ति पर कब्ज़ा करना आसान हो जाता है।

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Chap- 8. धार्मिक तथा अन्य ट्रस्टों को करों में मिलनेवाली छूट

सभी धार्मिक तथा दान संस्थाओं एवं अन्य ट्रस्टों से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा उन्हें प्राप्त होने वाली करों में छूट है। यहाँ मैंने सभी ट्रस्टों चाहे वह धार्मिक हो या दान सम्बन्धी अथवा शैक्षिक या किसी और प्रकार की, उनके करों में छूट के लिए एक समान संरचना का प्रस्ताव रखा है।

मेरे द्वारा प्रस्तावित यह संरचना इस प्रकार है-

1. प्रत्येक वयस्क नागरिक ट्रस्टों को करों में समान रूप से एक निश्चित रकम की छूट देने में समर्थ होगा। जैसे- 1000 रूपये प्रति नागरिक प्रति वर्ष (2 से अधिक बच्चे होने पर यह कम हो जायेगा), जो कि 10 बराबर इकाइयों में बंटे हों।

2. नागरिक पटवारी के दफ्तर में जाकर अपने हिस्से की इकाइयों (यूनिट) को किसी एक ट्रस्ट या एक से अधिक ट्रस्टों को दे सकता है। उदहारण के लिए वह 1 यूनिट ट्रस्ट A को, 2 यूनिट ट्रस्ट B को, 5 यूनिट ट्रस्ट C को, तथा शेष 2 यूनिट ट्रस्ट D को दे सकता है।

3. किसी भी ट्रस्ट को करों में प्राप्त होने वाली छूट की रकम उतनी हीं होगी जितना कि उसके द्वारा प्राप्त यूनिटों को प्रति यूनिट आवंटित रकम से गुणा करने पर प्राप्त होगा।

4. प्रत्येक यूनिट समान रकम की होगी जो कि प्रत्येक नागरिक के लिए बिना किसी धर्म, जाति इत्यादि के भेदभाव के समान होगी। यद्द्यपि उम्र, बच्चों की संख्या आदि के आधार पर अंतर हो सकता है। प्रति यूनिट रकम का निर्धारण संसद द्वारा प्रति वर्ष किया जायेगा।साथ हीं, दान पर दोहरे करारोपण का प्रावधान नहीं होगा, किन्तु अधिकतम कर हीं मान्य होगा। उदाहरण के लिए यदि आय कर दर प्रति व्यक्ति 0%, 10%, 20% तथा 30% है तो यदि कोई व्यक्ति A जो कि 30% की कर सीमा में है, ट्रस्ट को 1000 रूपये दान देता है तब उस दान पर लगनेवाला कर 0% होगा। किन्तु यदि एक व्यक्ति 0%, 10%, या 20% की कर सीमा में है और वह 1000 रूपये दान देता है तब उनके द्वारा दिए गये दान पर क्रमशः 30%, 20% तथा 10% कर लगेगा। सभी नकद दान पर 30% की दर से कर लगेगा। सभी विदेशी दान पर 30% की दर से कर लगेगा। संपत्ति पर कर सामूहिक (कॉर्पोरेट) दर से लगाया जायेगा। सभी प्रकार के करों में (छूट के लिए प्राप्त यूनिटों की संख्या * प्रति यूनिट रकम) की छूट लागू होगी।

करारोपण के विस्तार में मैं नहीं जाना चाहूंगा। किन्तु पाठक कृपया ध्यान दें- इस प्रस्ताव के अनुसार धार्मिक ट्रस्टों को संपत्ति कर तथा आय कर में असीमित छूट प्राप्त नहीं होगी, जो कि उन्हें वर्त्तमान में प्राप्त है। उनकी आय तथा उनके द्वारा प्राप्त दान पर भी कर लगेगा। तथा करों में उन्हें मिलने वाली छूट उनके अनुयायियों की संख्या के समानुपाती होगी, और वह भी तब जबकि अनुयायी उन्हें छूट की यूनिट्स देते हैं।

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Chap- 9. मेरे द्वारा प्रस्तावित समाधान संक्षेप में

हिन्दू मंदिरों के लिए मैं यहाँ सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम जैसी एक संरचना प्रस्तावित करने जा रहा हूँ। समस्या यह है कि हिन्दू धर्म में अनेक संप्रदाय हैं तथा इनमें से प्रत्येक स्वयं को दूसरे से अलग रखना चाहता है। साथ हीं एक मुख्य समस्या करों से सम्बंधित है। धार्मिक ट्रस्टों पर कॉर्पोरेट के समतुल्य हीं परन्तु कुछ छूट के साथ कर लगाये जाते हैं। यदि ट्रस्टों पर कर नहीं लगाया जाये तो लोग ट्रस्ट बनाकर उसके माध्यम से करों से बचने लगेंगे। एक अन्य मुद्दा राज्य- केंद्र सम्बन्ध तथा भाषा का है। भाषा की समस्या के चलते सभी राज्य अपने सभी मंदिरों का प्रबंधन केंद्र के अधिकार में नहीं देना चाहते।

मैं जो समाधान प्रस्तावित कर रहा हूँ उसमें तीन प्रकार के HMPC= हिन्दू मंदिर प्रबंधक समिति के गठन का प्रावधान है- एक राष्ट्रीय स्तर पर, प्रत्येक राज्य के लिए एक, तथा प्रत्येक संप्रदाय के लिए एक। प्रत्येक समिति में एक प्रमुख तथा 4 ऐसे सदस्य होंगे जिनका निर्वाचन मतदाताओं द्वारा 2 वर्ष के कार्यकाल के लिए होगा। किन्तु किसी भी दिन मतदाता SMS/ ATM द्वारा अथवा पटवारी के कार्यालय में स्वयं जाकर उन्हें वापस बुलाने का मत देकर वापस भी बुला सकते हैं। प्रत्येक HMPC को धार्मिक ट्रस्ट की श्रेणी प्राप्त होगी। एक व्यक्ति इसके निर्वाचित सदस्य के तौर पर अपने पूरे जीवनकाल में अधिकतम 4 वर्ष हीं रह सकता है। साथ हीं पुजारी तथा कर्मचारियों की नियुक्ति लिखित परीक्षा द्वारा होगी तथा ज्यूरी सिस्टम का उपयोग करके इन्हें पदच्युत किया जा सकेगा। नियमित अदालत की न्यायपीठ (ज्यूरी) द्वारा आपराधिक मामलों की सुनवाई होगी।प्रत्येक HMPC की सम्पत्ति पर कर लगेगा, तथा 100 रूपये (या एक निश्चित रकम) प्रति सदस्य प्रति वर्ष चुकाने का नियम लागू होगा। प्रत्येक नागरिक 5 ट्रस्टों को करों में राहत या छूट प्रदान कर सकता है। करारोपण के नियम सभी ट्रस्टों के लिए समान होंगे, चाहे वे हिन्दू, क्रिस्चियन, सिख, जैन, मुस्लिम, बौद्ध या कोई अन्य दान संस्था अथवा ट्रस्ट हों। एक नागरिक कितने भी ट्रस्टों का सदस्य हो सकता है। सदस्य दो प्रकार के हो सकते हैं- मतदाता सदस्य तथा गैर- मतदाता सदस्य। सिर्फ मतदाता सदस्य हीं समिति सदस्यों का निर्वाचन कर सकते हैं।

इसका विस्तृत वर्णन इस प्रकार है-

1. NHDPT= ( राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट): प्रत्येक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध आदि इस ट्रस्ट के जन्मजात मतदाता सदस्य होंगे, जब तक कि वे स्वयं अपनी सदस्यता नहीं छोड़ देते। इस ट्रस्ट को अपनी ओर से करों में छूट का लाभ वे दे भी सकते हैं और नहीं भी, किन्तु प्रत्येक स्थिति में उनका मतदान का अधिकार बना रहेगा। मुस्लिम तथा क्रिश्चियन इस ट्रस्ट के सदस्य नहीं बन सकते। ट्रस्ट के प्रमुख का निर्वाचन सभी सदस्य मिलकर करते हैं, तथा उनके पास उसे वापस बुलाने का अधिकार भी होता है। प्रमुख द्वारा 4 व्यवस्थापकों की नियुक्ति की जाती है, जिन्हें कि मतदाता सदस्य चाहें तो हटा सकते हैं। ट्रस्ट को आय कर तथा सम्पत्ति कर देना होगा, तथा इसे करों में छूट उसी अनुपात में मिलेगी जितने छूट के यूनिट उसे सदस्यों द्वारा प्राप्त होंगे। आरम्भ में NHMPT मात्र 4 मंदिरों का प्रबंधन करेगी- कश्मीर का अमरनाथ देवालय, राम जन्म भूमि देवालय, कृष्ण जन्म भूमि देवालय तथा काशी विश्वनाथ देवालय। आगे चलकर यह अन्य मंदिरों का प्रबंधन भी कर सकती है, यदि सम्बंधित संप्रदाय स्वेच्छा से मंदिर को इसके सुपुर्द कर दे।

2. RHDPT= ( राज्य हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट): प्रत्येक राज्य में एक RHDPT होगा, जिसके सदस्य उस राज्य के प्रत्येक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध आदि मतदाता होंगे, तथा वे तब तक सदस्य बने रहेंगे जब तक कि वे स्वयं अपनी सदस्यता न छोड़ना चाहें। वे चाहें तो अपनी ओर से ट्रस्ट को करों में छूट का लाभ दे सकते हैं और नही भी दे सकते, इससे उनका मतदान का अधिकार प्रभावित नही होगा। मुस्लिम तथा क्रिश्चियन इस ट्रस्ट के सदस्य नहीं बन सकते। ट्रस्ट के प्रमुख का निर्वाचन सभी सदस्य मिलकर करेंगे, तथा उनके पास उसे वापस बुलाने का अधिकार भी होगा। प्रमुख द्वारा 4 व्यवस्थापकों की नियुक्ति की जायेगी, जिन्हें कि मतदाता सदस्य चाहें तो हटा सकते हैं। ट्रस्ट को आय कर तथा सम्पत्ति कर देना होगा, तथा इसे करों में छूट उसी अनुपात में मिलेगी जितने छूट के यूनिट उसे सदस्यों द्वारा प्राप्त होंगे। आरम्भ में RHDPT राज्य के उन्हीं मंदिरों की व्यवस्था करेगा जिन्हें कि सम्बंधित संप्रदाय उस राज्य के सम्पूर्ण हिन्दू समुदाय के सुपुर्द करना चाहेगा।

3. RT = ( रिलिजियस ट्रस्ट अथवा धार्मिक ट्रस्ट): जितने भी हिन्दू ट्रस्ट अस्तित्व में हैं उनमें से प्रत्येक को इस श्रेणी में रखेंगे। आरम्भ में सिर्फ ट्रस्टी हीं VM= वोटिंग मेंबर (मतदाता सदस्य) होंगे, तथा NVM= नॉन वोटिंग मेंबर्स (गैर मतदाता सदस्य) की संख्या शून्य होगी। फिर वर्त्तमान मतदाता सदस्य 67% के बहुमत के साथ और मतदाता सदस्यों तथा गैर मतदाता सदस्यों को जोड़ सकते हैं। कोई एक नागरिक कितने भी धार्मिक ट्रस्टों में मतदाता सदस्य तथा गैर मतदाता सदस्य हो सकता है, बशर्ते उस धार्मिक ट्रस्ट को भी अपने सदस्यों के अन्य ट्रस्टों के सदस्य बनने से कोई एतराज न हो। प्रमुख की नियुक्ति मतदाता सदस्यों (VMs) द्वारा होती है जो कि 4 व्यवस्थापकों की नियुक्ति करता है। मतदाता सदस्य प्रमुख या किसी भी व्यवस्थापक को किसी भी दिन हटा सकते हैं। ट्रस्ट को आय कर तथा सम्पत्ति कर देना होगा, तथा इसे करों में छूट उसी अनुपात में मिलेगी जितने छूट के यूनिट उसे सदस्यों द्वारा प्राप्त होंगे। यदि इस ट्रस्ट (RT) में ऐसा कोई आतंरिक कानून है कि मतदाता सदस्यों के बच्चे भी मतदाता सदस्य बन जायेंगे तो स्वतः वे बच्चे मतदाता सदस्य बन जायेंगे। और एक बार यदि कोई RT इस नियम को लागू करती है तो फिर वह उसे रद्द नहीं कर सकती।

4. मुस्लिम तथा क्रिश्चियन धार्मिक ट्रस्टों की व्यवस्था वर्त्तमान कानूनों के अनुसार हीं होगी। करों के लिए भी उनपर समान नियम लागू होंगे। तथा करों में उन्हें प्राप्त होने वाली छूट भी उनके सदस्यों द्वारा प्राप्त होने वाले कर छूट के यूनिटों के अनुपात में होगी।वर्त्तमान में भारत में धार्मिक ट्रस्ट कोई आय कर तथा सम्पत्ति कर नहीं देते, इसमें बदलाव आएगा ।

इस प्रावधान के लागू होने पर सभी ट्रस्टों को अपने स्वामित्त्व वाले प्लाट/ इमारतों तथा सोना/ चांदी के बाजार मूल्य के अनुसार तथा अपनी आय तथा प्राप्त होने वाले दान के अनुसार कर चुकाने होंगे। करों में छूट इस बात पर निर्भर करेगी कि नागरिकों से कर छूट के कितने यूनिट उन्हें प्राप्त होते हैं। वर्त्तमान ट्रस्टों के लिए ट्रस्टी हीं मतदाता सदस्य माने जायेगे, तथा उन्हें गैर मतदाता सदस्यों की आवश्यकता नहीं होगी।

क्रमशः अगले कमेन्ट में....

kmoksha
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Re: प्रस्तावित कानून-ड्राफ्ट - हिन्दू सम्प्रदायों को सिख धर्म की तरह सशक्त बना सकते हैं

Post by kmoksha » Thu Oct 16, 2014 5:12 pm

... क्रमशः पिछले कमेन्ट से

Chap- 10. राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट का विवरण


प्रधान मंत्री द्वारा निम्नलिखित ड्राफ्ट को राजपत्र में प्रकाशित करने के बाद राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (NHDPT) अस्तित्व में आएगा:

[अधिकारी, जिसके पद का नाम कोष्ठ [ ] में दिया गया है, वह अधिकारी होगा जो कि सम्बंधित निर्देशों को लागू करेगा]

[परिभाषाएं]

• ‘ट्रस्ट’ शब्द से अभिप्राय ‘राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' (NHDPT) से है।

• ‘अध्यक्ष’ शब्द का अभिप्राय है ट्रस्ट का अध्यक्ष।

• ‘ट्रस्टी’ शब्द का तात्पर्य है ट्रस्ट का ट्रस्टी।

• ‘हिन्दू नागरिक’ शब्द का तात्पर्य एक पंजीकृत मतदाता से है जो कि हिन्दू, सिख, बौद्ध, या जैन है, अथवा जिसे कि अध्यक्ष द्वारा हिन्दू कहकर सम्बोधित किया जाये, जबतक कि उस नागरिक ने स्वयं को गैर हिन्दू नहीं कहा हो।

• शब्द ‘सकता है’ (May) का अभिप्राय है 'सम्भावना है' अथवा 'जरूरी नही है।' तथा स्पष्टतः इसका तात्पर्य है 'कोई बाध्यता नही है।'

धारा- 1 : अध्यक्ष तथा ट्रस्टी की नियुक्ति एवं प्रतिस्थापन

1.1 [प्र. मं. ] प्रधानमंत्री राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (NHDPT) का गठन करेगा, जिसका कार्यकारी अध्यक्ष प्र. मं. स्वयं अथवा उसके द्वारा मनोनीत कोई एक हिन्दू मन्त्री होगा, तथा उसी की पसंद के 4 हिन्दू मंत्री ट्रस्टी के रूप में होंगे।

1.2 [कलेक्टर] यदि 30 वर्ष से अधिक उम्र का कोई भी भारतीय नागरिक अध्यक्ष बनना चाहे तो वह कलेक्टर के समक्ष उपस्थित होगा। कलेक्टर उससे सांसद चुनाव के लिए जमा की जाने वाली जमानत रकम की तरह ही एक निश्चित रकम लेकर एक क्रम संख्या जारी करेगा, तथा उसका नाम प्र. मं. की वेबसाइट पर रखेगा।

1.3 [तलाटी / पटवारी, ग्राम अधिकारी ( अथवा उसके लिपिक) ]

(1.3.1) यदि एक नागरिक व्यक्तिगत रूप से तलाटी / पटवारी के कार्यालय आता है, 3 रूपये का शुल्क चुकाता है, तथा अधिकतम 5 व्यक्तियों के नामों का अनुमोदन अध्यक्ष के पद के लिए करता है, तो तलाटी उसके अनुमोदन को कम्प्यूटर में वेबसाइट पर दर्ज करेगा तथा उसे एक प्राप्ति रसीद देगा, जिसमें उसका मतदाता पहचान पत्र #, तिथि/ समय, तथा उसके द्वारा अनुमोदित व्यक्तियों के नाम होंगे। बीपीएल कार्ड धारकों के लिए यह शुल्क मात्र 1 रूपये होगी।

(1.3.2) यदि कोई नागरिक अपना अनुमोदन रद्द करना चाहता है तो वह तलाटी / पटवारी के कार्यालय जायेगा, तथा तलाटी उसके कहने पर बिना कोई शुल्क लिए उसके एक या एक से अधिक अनुमोदन रद्द कर देगा।

(1.3.3) कलेक्टर मतदाता को एसएमएस द्वारा फीडबैक भेजने हेतु एक पद्धति निर्मित कर सकता है।

(1.3.4) कलेक्टर मतदाता के उँगलियों के निशान तथा तस्वीर लेकर उन्हें रसीद पर डालने कि पद्धति भी बना सकता है।

(1.3.5) मतदाताओं को एसएमएस द्वारा अपना अनुमोदन दर्ज कराने में सक्षम बनाने हेतु प्र. मं. कुछ माध्यमों को शामिल कर सकता है। प्र. मं. ऐसी पद्धति बना सकता है जिसमें मतदाता अपना अनुमोदन एटीएम द्वारा दर्ज करा सकते हैं।

1.4 [ तलाटी / पटवारी ] तलाटी नागरिक की पसंद को जिले की वेबसाइट पर उसके मतदाता पहचान पत्र संख्या तथा प्राथमिकता क्रम में पसंद के साथ दर्ज करेगा।

1.5 [ कलेक्टर ] प्रत्येक सोमवार को कलेक्टर प्रत्येक उम्मीदवार को प्राप्त अनुमोदनों की कुल संख्या सार्वजनिक रूप से दर्शायेगा।

1.6 [ प्र. मं. ] यदि किसी उम्मीदवार को हिन्दू नागरिकों की कुल संख्या में से 35% का अनुमोदन प्राप्त हो जाता है, तथा यदि यह संख्या वर्त्तमान अध्यक्ष को प्राप्त अनुमोदन से 1 करोड़ अधिक हो, तो प्र. मं. उसे नया अध्यक्ष नियुक्त कर सकते हैं।

1.7 [ कलेक्टर ] यदि 30 वर्ष से अधिक उम्र का कोई भी भारतीय नागरिक ट्रस्टी बनना चाहे तो वह कलेक्टर के समक्ष उपस्थित होगा। कलेक्टर उससे सांसद चुनाव के लिए जमा की जाने वाली जमानत रकम की तरह ही एक निश्चित रकम लेकर एक क्रम संख्या जारी करेगा, तथा उसका नाम प्र. मं. की वेबसाइट पर रखेगा।

1.8 [ तलाटी / पटवारी, ग्राम अधिकारी ( अथवा उसके लिपिक) ]

(1.8.1) यदि एक नागरिक व्यक्तिगत रूप से तलाटी / पटवारी के कार्यालय आता है, 3 रूपये का शुल्क चुकाता है, तथा अधिकतम 5 व्यक्तियों के नामों का अनुमोदन ट्रस्टी के पद के लिए करता है, तो तलाटी उसके अनुमोदन को कम्प्यूटर में वेबसाइट पर दर्ज करेगा तथा उसे एक प्राप्ति रसीद देगा, जिसमें उसका मतदाता पहचान पत्र #, तिथि/ समय, तथा उसके द्वारा अनुमोदित व्यक्तियों के नाम होंगे। बीपीएल कार्ड धारकों के लिए यह शुल्क मात्र 1 रूपये होगी।

(1.8.2) यदि कोई नागरिक अपना अनुमोदन रद्द करना चाहता है तो वह तलाती के कार्यालय जायेगा, तथा तलाती उसके कहने पर बिना कोई शुल्क लिए उसके एक या एक से अधिक अनुमोदन रद्द कर देगा।

(1.8.3) कलेक्टर मतदाता को एसएमएस द्वारा फीडबैक भेजने हेतु एक पद्धति निर्मित कर सकता है।

(1.8.4) कलेक्टर मतदाता के उँगलियों के निशान तथा तस्वीर लेकर उन्हें रसीद पर डालने कि पद्धति भी बना सकता है।

(1.8.5) मतदाताओं को एसएमएस द्वारा अपना अनुमोदन दर्ज कराने में सक्षम बनाने हेतु प्र. मं. कुछ माध्यमों को शामिल कर सकता है। प्र. मं. ऐसी पद्धति बना सकता है जिसमें मतदाता अपना अनुमोदन एटीएम द्वारा दर्ज करा सकते हैं।

1.9 [ प्र. मं. ] यदि किसी उम्मीदवार को हिन्दू नागरिकों की कुल संख्या में से 35% का अनुमोदन प्राप्त हो जाता है, तथा यदि यह संख्या न्यूनतम अनुमोदन प्राप्त करनेवाले ट्रस्टी को प्राप्त अनुमोदन से 1 करोड़ अधिक हो, तो प्र. मं. उसे नया ट्रस्टी नियुक्त कर सकते हैं, तथा न्यूनतम अनुमोदन प्राप्त ट्रस्टी को हटा सकते हैं।

1.10 [ प्र. मं. ] एक हीं व्यक्ति ट्रस्टी के साथ साथ अध्यक्ष पद के लिए भी उम्मीदवार हो सकता है।

1.11 [ प्र. मं. ] यदि किसी व्यक्ति ने ट्रस्टी या अध्यक्ष के पद पर 1000 दिनों तक कार्य कर लिया है तो प्र. मं. उसे हटा कर अधिकतम अनुमोदन प्राप्त करनेवाले व्यक्ति को उसकी जगह नियुक्त करेगा।

1.12 [ ट्रस्टी ] अध्यक्ष तथा ट्रस्टी मिलकर ट्रस्ट को चलाने तथा कर्मचारियों की व्यवस्था हेतु आवश्यक नियम बनाएंगे।

1.13 [प्र. मं.] यदि कोई ट्रस्टी अथवा अध्यक्ष किसी अन्य धार्मिक ट्रस्ट का ट्रस्टी या कर्मचारी बन जाता है तो ऐसी स्थिति में प्र. मं. उसे पदच्युत करके उसकी जगह ट्रस्टी या अध्यक्ष पद के ऐसे उम्मीदवार को नियुक्त करेगा जिसे अधिकतम व्यक्तियों का अनुमोदन प्राप्त हो।

धारा- 2 : ट्रस्ट की व्यवस्था तथा सदस्यता

2.1 [ अध्यक्ष ] ट्रस्ट की व्यवस्था अध्यक्ष करेगा। पुजारी तथा अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति अध्यक्ष द्वारा लिखित परीक्षा आयोजित करके 1000 दिनों के कार्यकाल के लिए की जायेगी।

2.2 [ अध्यक्ष ] कर्मचारियों के खिलाफ शिकायतों की सुनवाई हेतु अध्यक्ष जूरी प्रणाली का निर्माण करेगा। अर्थात वह जूरी प्रणाली का प्रारूप तैयार कर उसे लागू करेगा तथा इसकी व्यवस्था हेतु अधिकारियों की नियुक्ति करेगा।

2.3 [ अध्यक्ष ] यदि कोई सरकारी कर्मचारी ट्रस्टी या कर्मचारी बन जाता है तो जूरी द्वारा सुनवाई के बाद अध्यक्ष उसे पद से हटा देगा।

2.4 [ अध्यक्ष ] यदि किसी कर्मचारी ने 2000 दिनों से अधिक कार्य कर लिया है तो अध्यक्ष जूरी द्वारा सुनवाई के पश्चात् उसे सेवा से हटा सकता है। तत्पश्चात वह कर्मचारी पुनः ट्रस्टी अथवा अध्यक्ष के तौर पर 1000 दिनों तक कार्य कर सकता है।

धारा- 3 : राष्ट्रीय मंदिर

3.1 [प्र. मं. ] भूमि के उपलब्ध होने पर प्र. मं. निम्नलिखित 4 भूभाग ट्रस्ट के सुपुर्द कर देंगे- कश्मीर में अमरनाथ देवालय, राम जन्मभूमि देवालय, कृष्ण जन्मभूमि देवालय, तथा काशी विश्वनाथ देवालय। इन 4 देवालयों की देखरेख तथा व्यवस्था ट्रस्ट करेगा।

3.2 [अध्यक्ष] यदि कोई सम्प्रदाय अपने किसी देवालय को ट्रस्ट के सुपुर्द करता है तो उसकी देखरेख भी ट्रस्ट करेगा। अगले 15 वर्षों के अंदर वह संप्रदाय चाहे तो अपने उस देवालय को वापस ले सकता है। 15 वर्ष की अवधि पूरी होने पर ट्रस्ट उस संप्रदाय से औपचारिक रूप से पूछेगा की क्या वह देवालय को वापस लेना चाहता है या नही। यदि उस समय संप्रदाय इसके लिए मना करता है तो वह देवालय हमेशा के लिए ट्रस्ट के देखरेख में हीं चलाया जायेगा।

धारा- 4 : सदस्यता एवं मताधिकार

4.1 [ अध्यक्ष/ प्र. मं. ] प्रत्येक व्यक्ति जो हिन्दू है तथा ट्रस्ट का गठन होने की तिथि को 18 वर्ष से अधिक उम्र का है, मतदाता सदस्य होगा। ट्रस्ट के गैर मतदाता सदस्य नहीं होंगे। हिन्दू शब्द का अभिप्राय हिन्दू धर्म के सभी संप्रदाय, सिख, जैन, बौद्ध आदि से है। यद्दपि यदि कोई व्यक्ति किसी भी माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि वह हिन्दू कहलाया जाना नहीं चाहता तो इस मतदाता सूची से उसका नाम हटा दिया जायेगा। बाद में जब वह पुनः हिन्दू कहलाया जाना चाहेगा तो उसका नाम पुनः इस सूची में शामिल कर लिया जायेगा।

4.2 [ प्र. मं. ] यदि कोई हिन्दू व्यक्ति स्वयं को गैर हिन्दू कहता है तो उसका अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति का स्थान इस कानून से प्रभावित नहीं होगा। यदि कोई अन्य कानून उसकी इस सामाजिक स्थिति को प्रभावित कर रहा हो, केवल तभी यह प्रभावित हो सकता है।

4.3 [ अध्यक्ष/ प्र. मं. अथवा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त अधिकारी ] यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम या क्रिश्चियन बन जाता है तो अध्यक्ष उसका नाम मतदाता सूची से 1 वर्ष के बाद स्थायी तौर पर हटा देगा, यदि वह इस अवधि के अंदर पुनः धर्म परिवर्तन कर के हिन्दू नहीं बनता। उस 1 वर्ष के अंतराल में वह मतदान नहीं कर सकता। साथ हीं यदि वह दोबारा धर्म परिवर्तन करता है तो ऐसी स्थिति में उसका नाम मतदाता सूची से बिना 1 वर्ष बीतने की प्रतीक्षा किये हमेशा के लिए हटा दिया जायेगा। किसी प्रकार के विवाद की स्थिति में जूरी का निर्णय हीं अंतिम होगा।

4.4 [ अध्यक्ष ] यदि कोई क्रिश्चियन या मुस्लिम व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर हिन्दू बनना चाहता है तो जूरी द्वारा उसकी पहचान की पुष्टि तथा अनुमोदन के बाद तथा सभी ट्रस्टियों के अनुमोदन के बाद अध्यक्ष उसका नाम मतदाता सूची में शामिल करेगा।

धारा- 5 : दान, आय तथा कर

5.1 ट्रस्ट किसी व्यक्ति अथवा अवैयक्तिक संस्था अथवा विदेशी व्यक्ति या संस्था से दान प्राप्त कर सकता है। साथ ही ट्रस्ट किसी भी व्यावसायिक गतिविधि में भी किसी भी कॉर्पोरेशन की तरह हीं भाग ले सकता है।

5.2 [ प्र. मं., मुख्य मंत्री ] प्रधान मंत्री तथा मुख्य मंत्री आय कर, संपत्ति कर तथा अन्य कर जो ट्रस्ट पर लागू हो रहे हैं, उनसे ले सकते हैं।

5.3 [ सभी ] दान पर कर : चंदे की रकम पर लगने वाला कर (अधिकतम दर- दानकर्ता द्वारा गत वर्ष चुकाया गया अधिकतम भाग) की दर से होगा। नकद दान तथा विदेशी दान पर अधिकतम कर लगाया जायेगा।

5.4 [ सभी ] करों में छूट : नागरिकों द्वारा प्रदान की गयी छूट की यूनिटों को प्रति यूनिट वित्त मंत्री द्वारा आवंटित रकम में गुना करने पर जो रकम प्राप्त होगी, ट्रस्ट करों में उतनी हीं छूट प्राप्त करेगा। नागरिक ट्रस्ट को कर राहत यूनिट तलाती के कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अथवा एसएमएस या एटीएम द्वारा प्रदान कर सकता है, तथा यह वित्त मंत्री द्वारा निर्धारित अन्तर्योजना के अनुसार होगा।

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chap-11 : राज्य हिन्दू देवालय प्रबंधन ट्रस्ट (RHDPT) का वर्णन: राज्य हिन्दू देवालय प्रबंधन ट्रस्ट (RHDPT)

अधिनियम तब अस्तित्व में आएगा जब मुख्य मंत्री इस ड्राफ्ट को राजपत्र में प्रकाशित करेंगे। यदि मुख्यमंत्री इसे प्रकाशित करने से मना करते हैं तो प्रधान मंत्री राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकते हैं तथा फिर राज्यपाल के माध्यम से इस अधिनियम को राजपत्र में प्रकाशित करा सकते हैं। यह ड्राफ्ट NHDPT की तरह हीं है, अंतर सिर्फ इतना है कि इसके अंतर्गत सदस्य वैसे हिन्दू होंगे जो सम्बंधित राज्य की सीमा के अंदर 6 माह से अधिक अवधि से निवास कर रहे हों अथवा मूल रूप से उस राज्य के निवासी हों। अर्थात प्रत्येक हिन्दू व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होगा कि वह दोनों में से किस RHDPT का सदस्य बनना चाहता है। किन्तु एक व्यक्ति एक हीं समय में दोनों राज्यों के RHDPT का सदस्य नहीं हो सकता। तथा यदि वह सदस्यता परिवर्तित करता है तो नयी सदस्यता 6 माह के उपरांत हीं सक्रिय होगी।

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chap-12 : भारतीय संप्रदाय देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (BSDPT) का वर्णन: प्रस्तावित भारतीय संप्रदाय देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (BSDPT)

अधिनियम अस्तित्व में तब आएगा जब इस ड्राफ्ट को प्रधान मंत्री राजपत्र में प्रकाशित करेंगे। मेरे विचार से, प्रधान मंत्री को सर्वप्रथम इसे संसद में पारित कराना होगा। यह ड्राफ्ट जटिल है, चूँकि जबकि मैं मंदिरों पर व्यक्तियों के एक खास समूह के नियंत्रण की जगह लोकतान्त्रिक नियंत्रण लाने का प्रस्ताव रख रहा हूँ, फिर भी ऐसा करने में किसी भी प्रकार के सरकारी बल अथवा कर प्रलोभन या कोई अन्य प्रलोभन देने का प्रस्ताव मैं नहीं कर रहा। मेरे विचार से यह रूपांतरण भक्तों को समझा कर लाया जा सकता है, ताकि प्रत्येक संप्रदाय के अनुयायी कुलीनतंत्र (खास व्यक्तियों के हाथों में व्यवस्था का केंद्रीकरण) छोड़कर लोकतान्त्रिक व्यवस्था अपनाएं। साथ हीं यह प्रस्तावित अधिनियम सिर्फ भारतीय सम्प्रदायों पर हीं लागू होगा, जिसमें सिख शामिल नहीं हैं। यद्द्यपि सिख धर्म भारतीय है, किन्तु इसके लिए पहले से हीं SGPC अधिनियम लागू है। अतः इसके संचालन के लिए किसी नए अधिनियम की जरूरत नहीं है। चूँकि क्रिश्चियन और इस्लाम मूल रूप से गैर हिन्दू हैं, अतः इनका संचालन किसी अन्य वर्तमान या नवीन अधिनियम द्वारा होगा।

इस ड्राफ्ट को समझने के लिए RTR PM ड्राफ्ट को समझना जरूरी है। RTR PM ड्राफ्ट http://rahulmehta.com/301.htm के section-6.6 में दिया गया है। दूसरा प्रमुख मुद्दा ट्रस्टियों के आपसी विवाद को सुलझाना है। इसके लिए कलेक्टर जूरी प्रणाली का प्रयोग करेगा। जूरी प्रणाली का वर्णन http://rahulmehta.com/301.htm के chap-21 में है। यहाँ प्रस्तावित पद्धति में वृहत आकार की जूरी का भी प्रावधान है, जैसे- 1500 से भी अधिक सदस्यों वाली जूरी। क्या इतनी वृहताकार जूरी संभव है? बिलकुल ! यदि 600 ई. पू. में ग्रीस में 1500 सदस्यों की जूरी हो सकती थी तो वर्तमान भारत में तो उस समय के ग्रीस से काफी उन्नत तकनीक है, अतः आज के भारत में भी यह संभव है। वर्तमान भारत में आम हो चुके भ्रष्टाचार को मिटाने तथा न्यायाधीशों के बीच सांठ- गाँठ रोकने हेतु इस प्रकार की वृहत्ताकार जूरी आवश्यक है। यहाँ तक कि अधिकांश छोटे- छोटे मुकदमों के लिए 10- 15 सदस्यों की लघु जूरी भी काफी है। किन्तु भारत में लोगों को भय है कि छोटे आकार की जूरी को रिश्वत देना या जोर जबरदस्ती करना अथवा दोनों हीं संभव है, यदि दांव बड़ा हो तथा एक या दोनों पक्ष धनवान तथा शक्तिशाली हों। अतः इस प्रकार के मामलों के लिए 100- 1500 तक की सदस्य संख्या वाली वृहत जूरी का प्रयोग होना चाहिए। ग्रीस में सुनवाई के उपरान्त सजा के लिए जूरी के सदस्य गोपनीय मतदान करते थे। वर्तमान समय में अधिकांश देशों में, जूरी सदस्यों का अंत न्यायालय में सबके सामने होता है, किन्तु रिकॉर्ड में नहीं रखा जाता। मैंने जूरी सुनवाई के मामले में खुले मतदान का प्रस्ताव रखा है। किन्तु मत तथा नाम रिकॉर्ड में नहीं रखे जायेंगे।

राज्य हिन्दू देवालय प्रबंधन ट्रस्ट (RHDPT) के लिए ड्राफ्ट निम्नलिखित है :

[अधिकारी, जिसके पद का नाम कोष्ठ [ ] में दिया गया है, वह अधिकारी होगा जो कि सम्बंधित प्रक्रिया को लागू करेगा]

[परिभाषाएं]

• प्रस्तुत अधिनियम उन ट्रस्टों के लिए लागू होगा जो कि हिन्दूओं, बौद्धों, अथवा जैनों के धार्मिक स्थल का स्वामित्व रखते हैं या उन पर स्वामित्व रखने की इच्छा प्रकट करते हैं, किन्तु यह सिखों, इस्लाम, क्रिश्चियन या पारसी धर्म स्थलों के स्वामित्व के लिए लागू नहीं होगा। इस अधिनियम के अंतर्गत सभी भारतीय धर्म तथा संप्रदाय आते हैं, जैसे- जैन, बौद्ध, शैव, वैष्णव, आर्य समाज आदि। यद्दपि सिख पंथ भी एक भारतीय संप्रदाय है किन्तु यह पहले से हीं SGPC अधिनियम के अंतर्गत आता है, अतः सिख पंथ को इस अधिनियम के सीमा क्षेत्र से बाहर रखा गया है।

• 'ट्रस्ट' शब्द का तात्पर्य धार्मिक ट्रस्ट से है, जैसा कि उपर्युक्त खंड में भी परिभाषित किया गया है।

• 'ट्रस्टी' शब्द का अभिप्राय वर्तमान ट्रस्टों में ट्रस्टी का हीं समानार्थक है।

• 'अध्यक्ष' का तात्पर्य ट्रस्टियों का प्रमुख से है।

• ‘सकता है’ (May) शब्द का अभिप्राय है 'सम्भावना है' अथवा 'जरूरी नही है।' तथा स्पष्टतः इसका तात्पर्य है 'कोई बाध्यता नही है।'

• NR तात्पर्य है राष्ट्रीय रजिस्ट्रार तथा DR का तात्पर्य है जिला रजिस्ट्रार, जिन्हें कि आगे परिभाषित किया गया है।

धारा- 1: मुख्य राष्ट्रीय/ जिला स्तरीय अधिकारियों की नियुक्ति

1.1 [ प्र. मं. ] प्रधान मंत्री एक अधिकारी की नियुक्ति करेगा जो कि भारतीय संप्रदाय ट्रस्टों का राष्ट्रीय रजिस्ट्रार (NRBST) या राष्ट्रीय रजिस्ट्रार (NR) के नाम से जाना जायेगा। NRBST को वापस बुलाने (recall करने) का अधिकार सम्पूर्ण भारत के सभी हिन्दू मतदाताओं को होगा (जिनमें सिख मतदाता भी शामिल होंगे, चूँकि सिख भी सदियों से गुरुद्वारों के अलावा हिन्दू मंदिरों में भी जाते रहे है, मंदिरों को दान देते रहे हैं, तथा मंदिरों की सुरक्षा हेतु काफी काम भी किया है।)

1.2 [ प्र. मं. ] NR को वापस बुलाने (Right to recall NR) की प्रक्रिया प्रधान मंत्री को वापस बुलाने की प्रक्रिया (Right to recall PM) के समान होगी। वर्तमान NR के प्रतिस्थापन के लिए न्यूनतम अनिवार्यता होगी कि एक वैकल्पिक उम्मीदवार को कम से कम 20 करोड़ मतदाताओं की स्वीकृति प्राप्त हो जाये, जो कि वर्तमान NR को प्राप्त स्वीकृतियों की कुल संख्या से कम से कम 1 करोड़ अधिक हो। इसे लागू करने के लिए प्र. मं. RTR PM के ड्राफ्ट को आधार बना सकता है।

1.3 [ मुख्य मंत्री ] मुख्य मंत्री एक अधिकारी की नियुक्ति करेगा जिसे भारतीय संप्रदाय ट्रस्टों के जिला रजिस्ट्रार (DRBST) या जिला रजिस्ट्रार (DR) के नाम से जाना जायेगा। इसे वापस बुलाने का अधिकार (RTR DR) सम्बंधित जिले के सभी हिन्दू मतदाताओं (जिनमें सिख भी शामिल हैं) को होगा। मुख्य मंत्री चाहे तो एक DRBST को 1 से अधिक जिलों में भी नियुक्त कर सकता है।

1.4 [ मुख्य मंत्री ] DRBST को वापस बुलाने की प्रक्रिया जिला शिक्षा अधिकारी को वापस बुलाने की प्रक्रिया (RTR DEO) के समान होगी। DR को प्रतिस्थापित करने के लिए अनिवार्य होगा कि एक वैकल्पिक उम्मीदवार जिले के कम से कम 51% मतदाताओं की स्वीकृति प्राप्त करे जो कि वर्तमान DR को प्राप्त स्वीकृतियों की कुल संख्या से कम से कम 5% अधिक हो। DR को वापस बुलाने का अधिकार (RTR DRBST) को लागू करने हेतु मुख्य मंत्री जिला शिक्षा अधिकारी को वापस बुलाने (RTR DEO) के ड्राफ्ट को आधार बना सकते हैं।

धारा- 2 : ट्रस्टों के नाम, उनकी संपत्ति, तथा ट्रस्टियों के नाम आदि को इंटरनेट पर सार्वजनिक करना एवं ट्रस्टियों सम्बन्धी विवादों पर निर्णय

2.1 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ] DR अपने जिले में प्रत्येक ट्रस्ट का नाम, उसकी क्रम संख्या, ट्रस्ट विलेख, सभी ट्रस्टियों के नाम तथा उनकी ट्रस्टी संख्या, तथा बाद में होने वाले परिवर्तनों का विवरण ट्रस्ट के लिए बनाये गए जिला वेबसाइट पर पोस्ट करेगा। यह सूचना NR भी ट्रस्ट के राष्ट्रीय वेबसाइट पर डालेगा।

2.2 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ] आरम्भ में DR ट्रस्टी संख्या जारी करेगा। आगे चलकर, NR के द्वारा जारी की गयी ट्रस्टी संख्या को हीं DR भी उपयोग करेगा। यदि ट्रस्टी चाहे तो अपनी आधार संख्या को ही ट्रस्टी संख्या के रूप में उपयोग कर सकता है। ऐसी स्थिति में DR भी उसके आधार संख्या को ही उपयोग करेगा।

2.3 [ ट्रस्टी, जिला रजिस्ट्रार (DR) ] सभी औपचारिक कार्यों के लिए ट्रस्टी को DR के पास अथवा DR द्वारा ट्रस्टों की व्यवस्था व कामकाज हेतु निर्धारित कार्यालय में जाना होगा। यदि ट्रस्टी उसी जिले में रहता है जिसमें की ट्रस्ट का पंजीकृत कार्यालय भी स्थित है, तो वह उसी DR के कार्यालय जायेगा। यदि ट्रस्टी किसी अन्य जिले में रहता है, तो वह अपने निवास वाले जिले के DR के कार्यालय अथवा जिस जिले में वह ट्रस्ट पंजीकृत है वहां के DR कार्यालय में जा सकता है।

2.4 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ]

( 2.4.1 ) DR प्रत्येक ट्रस्ट से 1000 रूपये प्रति वर्ष का शुल्क तथा प्रत्येक ट्रस्टी/ अध्यक्ष से प्रति ट्रस्ट जितने ट्रस्टों का वह ट्रस्टी/ अध्यक्ष है, 1000 रूपये प्रति वर्ष का शुल्क लेगा।

( 2.4.2 ) यदि ट्रस्टी जिस जिले में ट्रस्ट पंजीकृत है उससे अलग किसी अन्य जिले में रहता है तो उसे प्रतिवर्ष 1000 रूपये प्रति ट्रस्ट जिनका कि वह सदस्य है तथा जो उसके निवास वाले जिले से बाहर है, अधिक देना होगा।

2.5 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ] इस अधिनियम के उपर्युक्त तथा समस्त खण्डों के अंतर्गत वर्णित भारतीय सम्प्रदायों से प्राप्त की गयी रकम का आधा भाग DR द्वारा NR को भेजा जायेगा।

2.6 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ] अध्यक्ष तथा ट्रस्टी अपनी जानकारी के अनुसार जहाँ तक संभव हो, ट्रस्ट के स्वामित्व में जितनी संपत्ति है उसका ब्यौरा प्रस्तुत करेंगे। इस सूची में ट्रस्ट के स्वामित्व वाली भूमि की स्थिति, इमारतों का क्षेत्र, नकदी, एफडी, शेयर, बांड, सोना, चांदी, फर्नीचर, किसी को दिया गया तथा किसी से लिया गया कर्ज या संपत्ति, के साथ साथ जिस इलाके में भूमि या इमारत स्थित है उसका चक्रीय दर (उर्फ़ जंत्री) शामिल होंगे।

2.7 [ राष्ट्रीय रजिस्ट्रार (NR) , जिला रजिस्ट्रार (DR) ] NR प्रत्येक DR से कहेगा कि वह सम्पूर्ण भारत के सभी ट्रस्टों की सूची में शामिल प्रत्येक संपत्ति का अपने जिले में चक्रीय दर प्राप्त करे। ट्रस्टी तथा DR द्वारा दिए गए दो अनुमानित मूल्यों में से अधिकतम मूल्य हीं NR द्वारा मान्य होगा।

2.8 [ राष्ट्रीय रजिस्ट्रार (NR), जिला रजिस्ट्रार (DR) ] NR तथा प्रत्येक DR जिले के ट्रस्टों की संपत्ति के अनुमानित मूल्यों की सूची तैयार करेंगे। यदि NR तथा DR द्वारा बताये गए अनुमानित मूल्यों में अंतर पाया जाता है तो ट्रस्ट की संपत्ति के निर्धारण में दोनों अनुमानित मूल्यों में से अधिकतम मूल्य हीं मान्य होगा।

धारा- 3: ट्रस्टी सम्बन्धी विवादों का निबटारा

3.1 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) , शिकायतकर्ता ] यदि कोई व्यक्ति दावा करता है कि उसका नाम गलती से ट्रस्टियों की सूची में शामिल हो गया है, तो वह DR के समक्ष प्रस्तुत होकर अपना नाम उस सूची से हटवा सकता है। यदि ट्रस्टी किसी अन्य जिले में निवास करता है तो वह DR के समक्ष उपस्थित होकर सार्वजनिक रूप से अपना नाम हटाने की मांग कर सकता है। नाम हटाने के लिए उसके द्वारा दिया गया आवेदन इंटरनेट पर रखा जायेगा, तथा 3 महीने के बाद उसका नाम हटा दिया जायेगा, यदि इस अवधि में वह यह दावा न करे कि यह आवेदन फर्जी था।

3.2 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) , शिकायतकर्ता ] यदि कोई व्यक्ति दावा करता है की वह किसी ट्रस्ट का ट्रस्टी है, किन्तु उसके नाम का उल्लेख ट्रस्टी के तौर पर नही किया गया है, तो इस कानून के पारित होने के 90 दिनों के अंदर वह DR के कार्यालय जायेगा तथा अपना दावा पेश करेगा। 5000 रूपये प्रति ट्रस्ट, जितने ट्रस्टों के लिए ऐसा दावा प्रस्तुत किया गया, जमा करा कर DR उसके दावे को नेट पर रखेगा। 90 दिन बीतने के बाद यह शुल्क हर 1 महीने की देर पर 1000 रूपये की दर से बढ़ेगा। इस कानून के पारित होने के 10 साल के बाद कोई दावा स्वीकार नहीं किया जायेगा

3.3 [ जिला रजिस्ट्रार (DR), ट्रस्टी ] यदि दावा प्राप्त करने के 30 दिनों के अंदर सभी ट्रस्टी DR के कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर दावा स्वीकार करते हैं, तो दावाकर्ता का नाम ट्रस्टी के तौर पर दर्ज कर लिया जायेगा। यदि किसी ट्रस्टी ने इसे स्वीकार नही किया तो उसका मत नहीं में माना जायेगा। ऐसी स्थिति में जिस जिले में ट्रस्ट अवस्थित है उसी जिले से DR एक जूरी का गठन करेगा।

3.4 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ] ट्रस्टी के मामले पर निर्णय लेने हेतु बनायी गयी जूरी का आकार इस बात पर निर्भर करेगा कि सम्पूर्ण भारत में ट्रस्ट की कितनी संपत्ति है। DR जिले की सीमा के अंदर निवास करने वाले 40- 55 साल की उम्र के हिन्दू मतदाताओं में से यादृच्छिक रूप से निम्नलिखित दिशानिर्देशों के अनुसार जूरी का गठन करेगा- 15 जूरी सदस्य + 1 और जूरी सदस्य प्रत्येक एक करोड़ की संपत्ति पर, जहाँ जूरी सदस्यों की अधिकतम संख्या 1500 होगी।

3.5 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) , जूरी ] जूरी सदस्य उस व्यक्ति की बात को सुनेंगे जो ट्रस्टी होने का दावा कर रहा है। साथ हीं वे उन ट्रस्टियों की बात भी सुनेंगे जो उस व्यक्ति के खिलाफ बोलना चाहते हैं। यह सुनवाई कम से कम 67% जूरी सदस्यों की उपस्थिति में होगी। प्रत्येक पक्ष बारी- बारी से 1- 1 घंटे एक दूसरे के बाद बोलेंगे। इस समय वे अपने पक्ष में गवाह भी प्रस्तुत कर सकते हैं। जब 50% जूरी सदस्य दोनों पक्षों से समाप्त करने को कहेंगे, तो सुनवाई 2 दिनों के बाद समाप्त हो जाएगी, जब तक कि 50% से अधिक जूरी सदस्य इसे जारी रखने का निर्णय न लें।

3.6 [ जिला रजिस्ट्रार (DR), जूरी] यदि ट्रस्ट की संपत्ति का NR द्वारा आंकलित मूल्य 200 करोड़ से ऊपर है, तथा 50% से अधिक जूरी सदस्यों ने किसी खास गवाह / ट्रस्टी का सार्वजनिक रूप से नार्को टेस्ट कराये जाने की मांग की, तथा यदि वह गवाह भी इसके लिए राजी है, तो DR फोरेंसिक विशेषज्ञ का प्रबंध करेगा तथा उस गवाह का नारको टेस्ट सार्वजनिक रूप से करायेगा। बिना गवाह की सहमति के उसका नार्को टेस्ट नही कराया जायेगा। DR नार्को टेस्ट से पूर्व 15 जूरी सदस्यों का यादृच्छिक रूप से चयन करेगा। प्रत्येक जूरी सदस्य नार्को टेस्ट के दौरान गवाह से पूछने के लिए सार्वजनिक रूप से 2 प्रश्न प्रस्तुत करेंगे। फिर सभी जूरी सदस्य उन प्रश्नों पर वोट देंगे। जिस जूरी सदस्य का प्रश्न चुना जायेगा उसे 1 और प्रश्न रखने की अनुमति मिलेगी, जिसपर पुनः सभी सदस्य वोट देंगे। इस तरीके से गवाह से पूछे जानेवाले प्रश्नो की सूची DR तैयार करेगा

3.7 [जिला रजिस्ट्रार (DR), जूरी] सुनवाई के पश्चात प्रत्येक जूरी सदस्य घोषणा करेगा कि व्यक्ति ट्रस्टी है या नही। यदि बहुमत में जूरी सदस्य इस बात से सहमत हैं कि व्यक्ति ट्रस्टी है, तो DR उसके नाम की घोषणा ट्रस्टी के रूप में कर देगा। अन्यथा DR यह घोषित करेगा कि वह व्यक्ति ट्रस्टी नही है। 3.8 [जिला रजिस्ट्रार (DR)] जूरी सदस्य उस व्यक्ति पर जो कि ट्रस्टी होने का दावा कर रहा था, अथवा उस ट्रस्टी या ट्रस्टियों पर जो उसके दावे का समर्थन या विरोध कर रहे थे, आार्थिक दंड भी आरोपित कर सकते हैं, यदि बहुमत में जूरी सदस्य यह घोषणा करते हैं कि इनमें से कोई भी व्यक्ति जानबूझकर गलत सूचना दे रहा था। ऐसे मामले में जूरी सदस्य जिन ट्रस्टियों पर फाइन लगने वाला है, उन्हें प्रति ट्रस्टी 1 दिन का समय सुनवाई के लिए देंगे। फाइन के तौर पर 15000 से कम की कोई भी रकम + जिस व्यक्ति को झूठ बोलने का दोषी पाया गया उसकी कुल संपत्ति का 1-5% के बीच का कोई भी भाग होगा। 3.9 [जिला रजिस्ट्रार (DR)] यदि हारनेवाला पक्ष आगे अपील करना चाहता है तो वह 15000 रूपये जमा कर सकता है, तथा जिला कलेक्टर राज्य के 3 जिलों को यादृच्छिक रूप से चुनेगा। हारनेवाला पक्ष उन जिलों के DR के समक्ष अपनी अपील दायर कर सकता है। प्रत्येक जिले का DR 10,000 रूपये की एक और जमाराशि प्राप्त करने के बाद उपर्युक्त आकार की हीं एक जूरी का गठन करेगा। 2 जूरियों का निर्णय अंतिम माना जायेगा।

धारा- 4: मतदाता सदस्यों की सूची बनाना तथा उसे इंटरनेट पर रखना

4.1 [ जिला रजिस्ट्रार (DR), ट्रस्टी]

(4.1.1) प्रस्तुत कानून के पारित होने के 6 माह के अंदर अध्यक्ष एवं प्रत्येक ट्रस्टी व्यक्तिगत रूप से DR के पास जाकर ट्रस्ट के सभी मतदाता सदस्यों की सूची, जो कि ट्रस्ट के दस्तावेजों तथा भविष्य की प्रतिबद्धताओं के अनुसार होगा, प्रस्तुत करेंगे।

(4.1.2) प्रत्येक सूची के पहले 1000 मतदाता सदस्यों के लिए DR प्रति सदस्य 50 रूपये का शुल्क, तथा उससे आगे की संख्या पर 20 रूपये प्रति सदस्य का शुल्क लगाएगा। इस रकम का भुगतान ट्रस्टी करेंगे, न कि ट्रस्ट। बाद में ट्रस्ट आंशिक या पूर्ण रूप से इस रकम की क्षतिपूर्ति कर सकता है।

(4.1.3) ट्रस्टी DR के कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर इस सूची पर हस्ताक्षर करेंगे।

(4.1.4) दो या दो से अधिक अथवा सभी ट्रस्टी मिलकर सम्मिलित रूप से एक हीं सूची दे सकते हैं या अलग- अलग सूची भी दे सकते हैं। उपर्युक्त शुल्क प्रति सूची लगाया जायेगा, इससे कोई मतलब नही कि कितने ट्रस्टियों ने उस सूची पर हस्ताक्षर किये हैं।

4.2 [ ट्रस्टी ] सूची प्रस्तुत करते समय ट्रस्टी को प्रत्येक मतदाता सदस्य के मत का मान भी बताना होगा। अथवा ट्रस्टी को यह अवश्य कहना होगा कि "सभी सदस्यों के मतों का मान बराबर है।" यदि मतों का मान अलग- अलग है तो उनका योग 100 होना चाहिए। यह मान दशमलव के अंकों में होना चाहिए, भिन्न में नही, तथा दशमलव के बाद अधिकतम 15 अंक होने चाहिए। यदि सभी मानों का योग 100 नही हो रहा हो तो DR प्रति सदस्य 50 रूपये का अतिरिक्त शुल्क लेकर मानों का आनुपातिक रूप से पुनः विभाजन सदस्यों के बीच करायेगा ताकि योग 100 हो जाये।

4.3 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) , ट्रस्टी ] मतदाता सदस्यों के पास एक चुनाव मतदाता संख्या, या पासपोर्ट संख्या, या PIO संख्या, या आधार संख्या होनी चाहिए। इंटरनेट पर दर्शाने के लिए केवल चुनाव मतदाता संख्या का उपयोग किया जायेगा। यदि मतदाता सदस्य के पास मतदाता संख्या नही है तो DR उसके लिए एक ट्रस्ट मतदाता संख्या जारी करेगा, जिसके लिए वह 200 रूपये प्रति सदस्य लेगा। उसी मतदाता संख्या का उपयोग वह मतदाता सदस्य सभी ट्रस्टों में करेगा जिनका वह सदस्य है।

4.4 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) , अध्यक्ष ] DR ट्रस्ट पर प्रति वर्ष निम्नलिखित शुल्क लगाएगा-

(i) 10 से कम मतदाता सदस्य- 500 रूपये प्रति मतदाता सदस्य प्रति वर्ष (ii) 10- 99 मतदाता सदस्य- 5000 रूपये + 50 रूपये प्रति मतदाता सदस्य प्रति वर्ष

(ii) 10- 99 मतदाता सदस्य- 5000 रूपये + 50 रूपये प्रति मतदाता सदस्य प्रति वर्ष (iii) 100- 1000 मतदाता सदस्य- 10,000 रूपये + 20 रूपये प्रति मतदाता सदस्य प्रति वर्ष यह शुल्क सभी सदस्यों पर लागू होगा, न कि प्रति सूची के आधार पर।

4.5 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ] ट्रस्टियों द्वारा प्रस्तुत की गयी प्रत्येक सूची को DR जिला वेबसाइट पर रखेगा। यदि एक हीं सूची प्रस्तुत की गयी है जो सभी ट्रस्टियों द्वारा अनुमोदित है, अथवा सभी ट्रस्टियों द्वारा अलग- अलग प्रस्तुत की गयी सभी सूचियों में मतदाता सदस्यों के नाम तथा उनके मतों का मान एक सा हो, तो DR कोई अतिरिक्त सूची तैयार नही करेगा। यदि विभिन्न ट्रस्टियों द्वारा प्रस्तुत की गयी सूचियों में मतदाता सदस्य और/ अथवा उनके मतों के मानों में भिन्नता हो तो DR प्रत्येक ट्रस्ट के लिए अलग- अलग सूची तैयार करेगा-

(i) समान मतदाता सूची, जिसमे वे सारे नाम शामिल होंगे जो सभी सूचियों में समान रूप से हों।

(ii) संयुक्त सूची, जिसमें सभी सदस्यों के नाम होंगे जिनके मतों का मान मध्यम हो, तथा सभी ट्रस्टियों द्वारा दिए गए मान होंगे। (iii) वैसे मतदाता सदस्य जो आधे से अधिक ट्रस्टियों की सूची में शामिल हों तथा जिनके मत का मूल्य शून्य न हो।

4.6 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) , मतदाता सदस्य ] यदि कोई मतदाता सदस्य दावा करता है कि वह एक मतदाता सदस्य नहीं है, तो वह DR के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर 'नॉट मेंबर' के आवेदन पर हस्ताक्षर कर सकता है। उसका आवेदन वेबसाइट पर रखा जायेगा। तथा 30 दिनों के बाद उस ट्रस्ट की मतदाता सूची से उसका नाम हटा दिया जायेगा। उसका नाम हटाने के बाद उसके मत का मान अन्य सभी सदस्यों के बीच आनुपातिक रूप से वितरित कर दिया जायेगा। तथा DR पुनः नई मतदाता सूची ट्रस्ट की वेबसाइट पर रखेगा। प्रत्येक नाम के हटने पर DR ट्रस्ट पर 100 रूपये प्रति नाम का शुल्क लगाएगा।

4.7 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) , मतदाता सदस्य ] यदि कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि वह ट्रस्ट का मतदाता सदस्य है, किन्तु उसका नाम मतदाता सदस्यों की सूची में नही है, अथवा सूची में उसके मत का मूल्य उचित से कम है, तब वह DR द्वारा ट्रस्ट के वेबसाइट पर मतदाता सदस्यों की सूची के रखे जाने के 90 दिनों के अंदर अपनी शिकायत DR के समक्ष दर्ज करा सकता है। DR उसकी इस शिकायत को जिला वेबसाइट पर रखेगा 90 दिन की अवधि बीत जाने पर यदि व्यक्ति शिकायत दर्ज करता है तो 100 रूपये प्रति माह की दर से अतिरिक्त शुल्क लगेगा। 10 वर्ष की अवधि बीत जाने पर कोई नाम शामिल नही किया जायेगा।

4.8 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ] इस प्रकार के मामलों पर निर्णय हेतु DR जिले की मतदाता सूची से 40- 55 साल की उम्र के 15- 1500 हिन्दू नागरिकों का यादृच्छिक रूप से चयन कर एक जूरी का गठन करेगा। जूरी का आकार ट्रस्ट की संपत्ति पर निर्भर करता है, जो कि 15 जूरी सदस्य + 1 और जूरी सदस्य प्रत्येक एक करोड़ की संपत्ति पर होगा।

4.9 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) , ट्रस्टी, जूरी सदस्य ] प्रत्येक ट्रस्टी जूरी सदस्यों के समक्ष सदस्यों के नाम की सूची उनके मतों के मान के साथ रखेगा। तथा DR भी अपनी राय तथा जानकारी के आधार पर सूची देता है। साथ हीं जूरी सदस्य यह अनुमति देते हैं कि कोई भी व्यक्ति अपनी ओर से मतदाता सदस्यों के नाम उनके मतों के मान के साथ प्रस्तुत कर सकता है।

4.10 [ जूरी सदस्य ] प्रत्येक जूरी सदस्य प्रत्येक सूची को 0- 100 अंक देगा। यदि किसी सूची को जूरी सदस्य ने कोई अंक नही दिया तो उसे प्राप्त अंक शून्य मान लिया जायेगा। जिस सूची को सर्वाधिक अंक मिलेंगे उसे हीं अंतिम सूची माना जायेगा।

4.11 [ जूरी सदस्य , जिला रजिस्ट्रार (DR) ] सूची को अंतिम रूप देने के बाद जूरी सदस्य 0 रूपये से लेकर ट्रस्ट की कुल संपत्ति के 2% तक की रकम निर्धारित करेंगे। DR मध्यस्थ के रूप में रकम ट्रस्ट की ओर से शुल्क के रूप में लेकर सूची बनाने वाले व्यक्ति को देगा। यदि यह सूची एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा बनाई गई होगी तो DR उनके बीच रकम का वितरण या तो सूची में दिए गए सूत्र के अनुसार करेगा या यदि कोई सूत्र नही दिया गया है तो बराबर करेगा।

4.12 [ मतदाता सदस्य, शिकायतकर्ता ] यदि कोई व्यक्ति मतदाता सदस्यों की सूची अथवा उनके मतों के मान के विभाजन से संतुष्ट नही है तो वे DR से अनुरोध कर सकते हैं कि वे 3 जिलों का यादृच्छिक रूप से चयन कर उन जिलों के DR को उसकी शिकायत भेजें। प्रथम जिले में जिस आकार की जूरी का गठन किया गया था उसी आकार की जूरी का गठन प्रत्येक DR 30 दिनों के अंदर करेगा। पहली सुनवाई में प्रस्तुत सूची पर प्रत्येक जूरी सदस्य 0- 100 अंक देगा। इस अपील में कोई नई सूची प्रस्तुत नहीं की जा सकती। तीनों जूरियों के द्वारा अधिकतम अंक प्राप्त करनेवाली सूची ही सभी DR द्वारा अंतिम मानी जाएगी।

4.13 [ जूरी सदस्य ] यदि जूरी सदस्यों को लगता है कि शिकायत व्यर्थ की थी तो वे 0 - शिकायतकर्ता की कुल संपत्ति का 1% तक फाइन लगा सकता है। जिस जिले में प्रथम सुनवाई हुई थी उसका DR मध्यस्थ के रूप में फाइन लेकर उस रकम को प्रशासनिक खर्चों में लगा देगा। 4.14 [जूरी सदस्य, जिला रजिस्ट्रार (DR)] अपील के बाद सूची को अंतिम रूप देने के बाद जूरी सदस्य 0 रूपये से लेकर ट्रस्ट की कुल संपत्ति के 2% तक की रकम निर्धारित करेंगे। DR मध्यस्थ के रूप में रकम ट्रस्ट की ओर से शुल्क के रूप में लेकर सूची बनाने वाले व्यक्ति को देगा। यदि यह सूची एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा बनाई गई होगी तो DR उनके बीच रकम का वितरण या तो सूची में दिए गए सूत्र के अनुसार करेगा या यदि कोई सूत्र नही दिया गया है तो बराबर करेगा।

धारा- 5: मतदाता सदस्यों की सूची को अंतिम रूप देने के बाद अध्यक्ष तथा ट्रस्टियों का प्रतिस्थापन

5.1 [ मतदाता सदस्य ] मतदाता सदस्य राइट टू रिकॉल की प्रक्रिया के द्वारा अध्यक्ष / ट्रस्टी को प्रतिस्थापित कर सकते हैं। इस प्रक्रिया के अंतर्गत कोई भी सदस्य किसी भी दिन अपनी स्वीकृति दर्ज या रद्द करा सकता है।

5.2 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ] जो स्वीकृतियां दर्ज करायी जाएँगी वे DR तथा NR की वेबसाइट पर आएँगी।

5.3 [ उम्मीदवार ] कोई भी व्यक्ति जो अध्यक्ष या ट्रस्टी बनना चाहेगा, DR के कार्यालय में ट्रस्ट की कुल संपत्ति का 1% के बराबर रकम का शुल्क जो कि कम से कम 2000 रूपये तथा अधिकतम 20000 रूपये हो सकता है, चुकाकर अपना नाम दर्ज करायेगा। उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी वहीँ से पेश करेगा जहाँ का वह पंजीकृत मतदाता होगा अथवा जहाँ वह ट्रस्ट पंजीकृत होगा। यदि जहाँ ट्रस्ट अवस्थित है वहां से DR कार्यालय अलग है तो अतिरिक्त शुल्क (1000 रू. + ट्रस्ट की संपत्ति का 1%), जो कि 3000 रूपये से अधिक नही होगी, लागू होगा।

5.4 [ मतदाता सदस्य ] एक मतदाता सदस्य अध्यक्ष के पद के लिए 5 उम्मीदवारों के नामों के लिए अपनी स्वीकृति तहसीलदार के कार्यालय में जाकर अपना पहचान पत्र दिखाकर कर दर्ज करा सकेगा। उसकी पसंद DR तथा NR की वेबसाइट पर रखी जाएँगी। DR तथा NR चाहें तो एसएमएस/ एटीएम माध्यम भी इसके लिए निर्मित व उपलब्ध करा सकते हैं। सदस्य किसी भी दिन अपनी स्वीकृति रद्द कर सकेगा। स्वीकृति दर्ज अथवा रद्द करने के लिए शुल्क होगा जो कि 50 रू. +ट्रस्ट की कुल संपत्ति का 0.0001%, तथा अधिकतम 1000 रूपये। शुल्क के सम्बन्ध में DR का निर्णय अंतिम होगा।

5.5 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ] यदि किसी अध्यक्ष पद के उम्मीदवार को प्राप्त स्वीकृतियों की कुल संख्या 50% या उससे अधिक हो जाये तथा यह वर्तमान अध्यक्ष को प्राप्त कुल स्वीकृतियों से 10% अधिक हो, तब DR उसे नया अध्यक्ष नियुक्त करेगा। यहाँ मतदाता सदस्यों के मतों को आवंटित मान को भी ध्यान में रखा जायेगा।

5.6 [ मतदाता सदस्य ] यदि ट्रस्ट के विलेख / दस्तावेजों के अनुसार ट्रस्ट के ट्रस्टियों की संख्या अवश्य हीं N होनी चाहिए, तो एक मतदाता सदस्य उस संख्या के दोगुनी संख्या तक उम्मीदवारों के लिए अपनी स्वीकृति दर्ज करा सकते हैं। अध्यक्ष के पद के लिए 2N उम्मीदवारों का अनुमोदन मतदाता सदस्य तहसीलदार के कार्यालय जाकर तथा अपना पहचान पत्र दिखाकर करेगा। उसकी पसंद को DR तथा NR की वेबसाइट पर रखा जायेगा। DR तथा NR चाहें तो SMS\ATM प्रणाली भी बना सकते है तथा उपलब्ध करा सकते हैं। तथा सदस्य अपनी स्वीकृति किसी भी दिन रद्द कर सकता है।

5.7 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ] यदि किसी ट्रस्टी पद के उम्मीदवार को 50% से अधिक मतदाता सदस्यों की स्वीकृति प्राप्त हो जाये, जो कि न्यूनतम स्वीकृति प्राप्त ट्रस्टी से 5% अधिक हो, तब उस न्यूनतम स्वीकृति प्राप्त ट्रस्टी को हटा कर उसकी जगह उस उम्मीदवार को ट्रस्टी बना दिया जायेगा।

धारा- 6: नए मतदाता सदस्यों के आगमन तथा मतदाता सदस्यों के निष्कासन सम्बन्धी नियम

6.1 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ] सभी ऐसे मामलों में जहाँ मतदाता सदस्य के मत का महत्व होता है, मत के मान (मूल्य) पर भी विचार किया जायेगा।

6.2 [ मतदाता सदस्य , जिला रजिस्ट्रार (DR) ] एक मतदाता सदस्य अपने मताधिकार को अपने जीते जी किसी को हस्तांतरित नहीं कर सकता।

6.3 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) ] यदि कोई मतदाता सदस्य किसी अन्य धर्मपरिवर्तन कर लेता है या किसी ऐसे संप्रदाय में शामिल हो जाता है जो कि परंपरागत रूप से अथवा ट्रस्ट के विलेख / दस्तावेजों के अनुसार अलग संप्रदाय माना जाता हो, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है। यदि इस मुद्दे पर ट्रस्ट की संविदा कुछ नही कहती, तथा यदि वह ट्रस्ट भारतीय धार्मिक संप्रदाय है, तो ट्रस्ट एक उपखण्ड में यह लिख सकता है कि " मतदाता सदस्य यदि अपना धर्म अथवा संप्रदाय परिवर्तन करते हैं, तो ट्रस्टियों तथा अन्य मतदाता सदस्यों के बहुमत द्वारा उनकी सदस्यता समाप्त कर दी जाएगी।" यदि उसका पुत्र भी पहले से एक मतदाता सदस्य है, तो उसके मत का मान बढ़ जायेगा।

6.4 [ अध्यक्ष , जिला रजिस्ट्रार (DR) , ट्रस्टी ] यदि एक मतदाता सदस्य की मृत्यु हो जाती है अथवा वह धर्म या संप्रदाय परिवर्तन कर लेता है तो उसके पुत्र तथा पुत्रियां मतदाता सदस्य बन जायेंगे, तथा उस व्यक्ति के मत का मान समानुपातिक रूप से पुत्र- पुत्रियों की संख्या के अनुसार उनके बीच बराबर बंट जायेगा। हालाँकि उस संप्रदाय के नियमानुसार अथवा ट्रस्ट की विलेख / दस्तावेजों के अनुसार यदि औरतें मतदाता सदस्य नही बन सकती, तो सिर्फ पुत्र हीं मतदाता सदस्य बनेंगे। यदि मतदाता सदस्य के बच्चे जीवित नही हैं, तो उसकी मृत्यु होने पर या धर्म परिवर्तन करने पर सदस्यता उसके पोते- पोतियों को हस्तांतरित हो जाएगी। यदि उसके पोते- पोतियां भी नही हैं तो सदस्यता का हस्तांतरण उसके भाई को अथवा भाई के बच्चों को हो जाएगी। यदि वे भी नहीं हैं, तो सदस्यता अगले नजदीकी रिश्तेदार को मिल जाएगी जैसा कि जूरी द्वारा तय किया जायेगा।

6.5 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) , ट्रस्टी ] ट्रस्ट सभी ट्रस्टियों के अनुमोदन के बाद तथा 75% से अधिक मतदाता सदस्यों के अनुमति से निम्नलिखित में से कोई एक या एक से अधिक खंड ट्रस्ट के विलेख (दस्तावेज) में जोड़ सकता है -

(i) मतदाता सदस्य आजीवन के लिए मतदाता सदस्य होगा।

(ii) मतदाता सदस्य के सभी बच्चे मतदाता सदस्य होंगे, तथा उसके मत का मान उसके बच्चों के बीच बराबर बाँट जायेगा।

(iii) मतदाता सदस्य यदि किसी अन्य धार्मिक ट्रस्ट का मतदाता सदस्य बन जाता है (राष्ट्रीय हिन्दू ट्रस्ट तथा राज्य हिन्दू ट्रस्ट के अलावे), तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी। एक बार यदि ये वाक्य ट्रस्ट के दस्तावेजों में आ गए तो फिर कभी हटाये नही जा सकते।

6.6 [ जिला रजिस्ट्रार (DR) , ट्रस्टी ] ट्रस्ट सभी ट्रस्टियों तथा 75% से अधिक मतदाता सदस्यों की अनुमति से यह निर्णय ले सकते हैं कि औरतों को मतदाता सदस्य बनाया जाना चाहिए अथवा नही। यह निर्णय सम्प्रदाय के परम्पराओं पर निर्भर कर सकता है। एक बार औरतों को मतदाता सदस्य बना देने के बाद ट्रस्ट उनसे यह अधिकार वापस नही ले सकता। साथ हीं यदि औरतें मतदाता सदस्य बनी, तो पिता की मृत्यु के बाद विवाहित तथा अविवाहित पुत्रियों को भी मताधिकार प्राप्त हो जायेगा।

6.7 [जिला रजिस्ट्रार (DR), ट्रस्टी ] ट्रस्ट सभी ट्रस्टियों तथा 75% से अधिक मतदाता सदस्यों की अनुमति से यह खंड ट्रस्ट के विलेख (दस्तावेज) में जोड़ सकता है कि "सभी मतदाता सदस्यों के मतों का मान बराबर होगा।" एक बार यदि यह खंड जोड़ दिया गया तो फिर कभी हटाया नही जा सकता। तथा भविष्य में सभी मतदाता सदस्यों को ट्रस्ट के चुनावों तथा इसके संपत्ति की व्यवस्था में समान अधिकार प्राप्त होगा। इस प्रकार के ट्रस्ट में मतदाता सदस्य के बच्चे भी 30 साल की उम्र हो जाने पर मतदाता सदस्य बन जायेंगे। यदि ट्रस्ट में औरतें भी मतदाता सदस्य बन सकती हैं तो मतदाता सदस्य की पत्नी भी शादी के 5 साल के बाद मतदाता सदस्य बन जाएगी।

6.8 [जिला रजिस्ट्रार (DR), ट्रस्टी] यदि एक मतदाता सदस्य किसी अन्य संप्रदाय ट्रस्ट का मतदाता सदस्य बन जाता है या धर्म परिवर्तन कर लेता है तो उसकी सदस्यता तथा मताधिकार समाप्त हो जायेगा। 6.9 [जिला रजिस्ट्रार (DR), ट्रस्टी] एक मतदाता सदस्य स्वेच्छा से भी अपनी सदस्यता का त्याग कर सकता है, तथा ऐसी स्थिति में उसके बच्चों को मतदाता सदस्यता प्राप्त हो जाएगी। एक बार सदस्यता का परित्याग करने पर वह इसे पुनः प्राप्त नही कर सकता, तथा इसके लिए उसे पुनः नया सदस्य के तौर पर जुड़ने के लिए प्रक्रिया से होकर गुजरना होगा

धारा- 7: संप्रदाय का विभाजन

7.1 [जिला रजिस्ट्रार (DR), ट्रस्टी] यदि सभी ट्रस्टी तथा 75% से अधिक मतदाता सदस्य ट्रस्ट को दो या दो से अधिक भागों में विभाजित करने को तैयार हो जाते हैं तो ऐसा वे 3 नए विलेख/ दस्तावेज बनाकर कर सकते हैं। एक ट्रस्ट जिसमें सर्वाधिक सदस्य होंगे, मुख्य ट्रस्ट होगा, तथा अन्य ट्रस्ट अलग अलग होंगे।

7.2 [जिला रजिस्ट्रार (DR), ट्रस्टी] विभाजन का अनुबंध में ही सभी सम्पत्तियों की सूची तथा किस ट्रस्ट को कौन सी संपत्ति मिलेगी इसका ब्यौरा होगा। जिन सम्पत्तियों की चर्चा नही की गयी वे मुख्य ट्रस्ट के पास रहेंगी। संपत्ति बंटवारे का आधार यह होगा कि किस ट्रस्ट के पास कितने मूल्य (मान) के मत जा रहे हैं।

7.3 [जिला रजिस्ट्रार (DR), ट्रस्टी] नए ट्रस्टों में मताधिकार अनुपात पूर्ववर्ती ट्रस्ट के समान हीं होगा।

7.4 [जिला रजिस्ट्रार (DR)] DR न्यूनतम 10000 रूपये तथा मूल ट्रस्ट के संपत्ति का 1% शुल्क के रूप में लेगा।

धारा- 8: दो ट्रस्टों का आपस में विलय

8.1 [जिला रजिस्ट्रार (DR), ट्रस्टी] यदि दो ट्रस्टों के सभी ट्रस्टी तथा 75% से अधिक मतदाता सदस्य आपस में विलय पर सहमत हो जाते हैं तो दोनों ट्रस्टों का आपस में विलय हो जायेगा।

8.2 [जिला रजिस्ट्रार (DR), ट्रस्टी] प्रथम तथा द्वितीय ट्रस्ट के सदस्यों के मताधिकारों का कुल योग का अनुपात विलय के अनुबंध में स्पष्ट होना चाहिए, तथा इस पर दोनों ट्रस्टों के सभी ट्रस्टियों एवं 75% मतदाता सदस्यों के हस्ताक्षर भी अवश्य होने चाहिए।

8.3 [जिला रजिस्ट्रार (DR), ट्रस्टी] पूर्ववर्ती ट्रस्ट के दो सदस्यों का मताधिकार मूल्य (मान) का अनुपात अपरिवर्तित रहेगा।

8.4 [जिला रजिस्ट्रार (DR), ट्रस्टी] DR उपर्युक्त दो नियमों के अनुसार नए मताधिकार जारी करेगा।

8.5 [जिला रजिस्ट्रार (DR)] DR न्यूनतम 10000 रूपये तथा प्रत्येक ट्रस्ट के संपत्ति का 1% शुल्क के रूप में लेगा।

धारा- 9: कर एवं शुल्क

9.1 [जिला रजिस्ट्रार (DR)] ट्रस्ट की संपत्ति का 0.1% DR वार्षिक शुल्क के रूप में रिकॉर्ड रखने के लिए लेगा।

9.2 [सभी] ट्रस्ट दान में प्राप्त आय को छोड़कर अपनी कुल आय का 30% कर के रूप में चुकाएगा। भारतीय नागरिकों के द्वारा प्राप्त दान को छोड़कर शेष सभी विदेशी दान पर 30% की दर से कर लगेगा। प्रवासी भारतीय नागरिकों के दान पर लगनेवाला कर 0% होगा। भारतीय नागरिको से प्राप्त दान पर लगनेवाला कर (30% - जिस दर से उसने गत वर्ष कर चुकाया है) होगा। नकद दान पर कर 30% की दर से लगाया जायेगा। ट्रस्ट अपने संपत्ति की बाजार दर का 1% कर के रूप में चुकाएगा।


9.3 [सभी] ट्रस्ट को करों में मिलने वाली छूट उतनी ही होगी जितनी कि उसे प्राप्त कर राहत यूनिट्स की कुल संख्या को प्रति यूनिट पर केंद्र सरकार द्वारा आवंटित रकम को गुना करने पर प्राप्त होगा।


धारा- 10: ट्रस्ट की व्यवस्था

10.1 [सभी] अध्यक्ष तथा ट्रस्टी प्रचलित नियमों, कानूनों तथा ट्रस्ट दस्तावेजों के अनुसार ट्रस्ट का प्रबंधन करेंगे।

------ end of draft -----

उपर्युक्त प्रस्तावित कानून ड्राफ्ट के अनुसार ट्रस्ट को अपनी प्रचलित विशेषतायें छोड़कर तथा स्वयं को बदलकर सिखवाद की तरह लोकतान्त्रिक व्यवस्था अपनाने की आवश्यकता नही होगी। लेकिन जैसे-जैसे एक या एक से अधिक संप्रदाय अपने सदस्यों को बराबर मताधिकार देना शुरू करेंगे, अन्य समान विश्वास वाले सम्प्रदायों जिनमें ऐसी लोकतान्त्रिक व्यवस्था नही है, के अनुयायियों का सामूहिक पलायन उन सम्प्रदायों की ओर होने लगेगा जिनके विश्वास तो समान हैं तथा लोकतान्त्रिक संरचना भी है। अथवा कम से कम नए सदस्य बनने तो बंद हो जायेंगे। अतः लोकतान्त्रिक संरचना वाले संप्रदाय ट्रस्टों के अनुयायियों की संख्या बढ़ेगी, जबकि लोकतान्त्रिक संरचना नहीं अपनाने वाले संप्रदाय ट्रस्ट अपने अनुयायियों को खोते जायेंगे।

हालाँकि अलोकतांत्रिक ट्रस्टों को संपत्ति का नुकसान नही होगा, किन्तु उन्हें नए दानकर्ता तथा नए दान/ चंदा मिलना कम हो जायेगा। समय बीतने के साथ साथ हिन्दू \भारतीय सम्प्रदाय ट्रस्टों के धार्मिक विश्वास कमोबेश आज की तरह हीं होंगे, किन्तु उनकी व्यवस्था प्रभावशाली बन जाएगी। उनके खातों में पारदर्शिता आएगी, अतः अज्ञात रूप से धन का संग्रह के अवसर भी कम होंगे।

अध्यक्ष एवं ट्रस्टी प्रत्येक 3-5 वर्ष पर बदल जायेंगे, अतः दान / चंदे की राशि के जमाख़ोरी की संभावना कम होगी। इस प्रकार व्यवस्थापक देश व समुदाय की रक्षा हेतु घायल सैनिकों, पुलिसकर्मियों, तथा शहीद होनेवाले सैनिकों, पुलिसकर्मियों, अथवा आम नागरिकों के परिजनों के कल्याण को प्राथमिकता देंगे। इससे समुदाय सशक्त बनेगा। साथ हीं चूँकि धन की जमाखोरी कम होगी, गणित / विज्ञान / कानून / शिक्षा तथा हथियार चलाने की शिक्षा जैसे कल्याणकारी कार्यों को बढ़ावा मिलेगा। पुनः इससे समुदाय सशक्त होगा।

सभी भारतीय सम्प्रदायों के लिए यह अनिवार्य नही है कि वे एक ही व्यवस्था के अंतर्गत संगठित हो जाएँ। महत्वपूर्ण मुद्दा उनके बीच असहमति को कम करना है। इसके लिए एक सामान्य जूरी प्रणाली होगी जो मतभेदों को घटा कर कम से कम करेगी। तथा प्रत्येक संप्रदाय के व्यवस्थापिका को ऐसा होना चाहिए कि उसका झुकाव संग्रह की ओर न हो।

अब एक पाठक जिसे इस विषय में बहुत रूचि है, पुनः यह पूछ सकता है कि यदि किसी संप्रदाय ट्रस्ट का प्रमुख उसके अनुयायियों को मतदाता सदस्य बनाने से मना करता है तो ऐसी स्थिति में क्या होगा? कोई बात नही, तब ऐसी स्थिति में संप्रदाय के कुछ संत उस ट्रस्ट को छोड़ कर अलग दूसरा ट्रस्ट आरम्भ कर देंगे जिसके धार्मिक विश्वास तो पहले ट्रस्ट की तरह हीं होंगे, किन्तु इसका हर अनुयायी मतदाता सदस्य होगा। अतः ज्यादा से ज्यादा अनुयायी पहले ट्रस्ट को छोड़कर नए ट्रस्ट में शामिल होने लगेंगे।

इसी प्रकार एक और प्रश्न महत्वपूर्ण है। यदि लोकतान्त्रिक संरचना ही इतनी सशक्त अवधारणा है तो सभी हिन्दू सिख क्यों नही बन गए? मेरे विचार से कारण यह था कि सिखों की लोकतान्त्रिक संरचना को तो अधिकांश हिन्दू पसंद करेंगे, किन्तु इनके कुछ विश्वासों जैसे मूर्तिपूजा का नापसंद करने को अधिकांश हिन्दुओं ने अस्वीकृत कर दिया।

हमारे द्वारा प्रस्तावित इस तरीके में आध्यात्मिक विश्वास तथा रीति रिवाज में बदलाव की जरुरत नही, केवल दान की प्रशासनिक व्यवस्था में परिवर्तन आएगा, और वह भी अनुयायियों की भलाई के लिए। अतः हमारे विचार से बदलाव आएगा और ये बदलाव न्यूनतम और आवश्यक बदलाव एवं इस बदलाव को समर्थन भी प्राप्त होगा ।

इसके अलावा, एक अलोकतांत्रिक संप्रदाय ट्रस्ट को लोकतान्त्रिक संप्रदाय ट्रस्ट में बदलने के लिए कोई सरकारी ताकत का उपयोग नही किया जायेगा, न ही कोई कर प्रलोभन दिया जायेगा। दोनों (अलोकतांत्रिक और लोकतान्त्रिक) ट्रस्टों पर कर सामान दर से लगेगा। प्रस्तुत कानून केवल एक व्यवस्था बनाता है, ताकि यदि कोई संप्रदाय लोकतान्त्रिक बनता है तो ट्रस्ट प्रमुख बाद में ट्रस्ट को अलोकतांत्रिक नही बना सके। इससे उनके द्वारा निर्मित लोकतान्त्रिक व्यवस्था में एक प्रकार का कानूनी स्थायित्व आएगा।

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अध्याय- 13: पाठकों का योगदान

जो व्यक्ति इस कानून को लागू कराना चाहते हैं अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश कर सकते हैं कि वे राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक समिति अधिनियम, राज्य हिन्दू देवालय प्रबंधक अधिनियम, तथा भारतीय सम्प्रदाय देवालय प्रबंधक समिति अधिनियम को राजपत्र में प्रकाशित करें। अपने सांसद को एसएमएस द्वारा कृपया #NDPCA , #RDPCA , #BSDPA भेजें। यदि आप चाहें तो आप #ddv7231590.NDPCA , #ddv7231590.RDPCA , # ddv7231590.BSDPA, भी भेज सकते हैं। यहाँ ddv7231590 लेखक का यानि मेरा, राहुल चिमन भाई मेहता के नाम से मतदाता पहचान पत्र संख्या है, कृपया ध्यान रहे कि मेरा मतदाता पहचान पत्र संख्या लिखना जरुरी नही है। यह तभी उपयोगी है यदि कोई अन्य व्यक्ति भी NDPCA आदि ड्राफ्ट प्रस्तुत करता है, तथा अपने ड्राफ्ट के लिए कोड भी #NDPCA ही देता है। ऐसी स्थिति में यदि मेरा मतदाता पहचान पत्र संख्या आपके एसएमएस में दिया गया है तो आपका एसएमएस उसके समर्थन में उपयोग नही किया जा सकेगा।

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अध्याय- 14: निष्कर्ष

मेरे विचार से उपर्युक्त प्रस्तावित कानून विभिन्न भारतीय सम्प्रदाय ट्रस्टों में दान में प्राप्त धन के संग्रह की प्रवृत्ति को कम करेंगे, अतः भारतीय सम्प्रदायों की व्यवस्था का उपयोग अनुयायियों को सशक्त बनाने में किया जा सकेगा। इससे प्रत्येक भारतीय संप्रदाय सिख धर्म की तरह ही सशक्त बन जायेगा। प्रस्तुत कानून बिना किसी बल प्रयोग या कर प्रलोभन दिए हुए राज्य/ राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न सम्प्रदायों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था लाने का रास्ता बताता है। वैसे व्यक्ति जो विद्वानों के लोकतंत्र विरोधी नियमों में विश्वास रखते हैं इन प्रस्तावों से सहमत नही होंगे। किन्तु इस कानून के लागू होने पर भी उनके लिए अपने ट्रस्ट को लोकतान्त्रिक बनाना अनिवार्य नही होगा। वे अपने वर्तमान उत्तराधिकार एवं गुरु प्रथा अथवा कुछ खास व्यक्तियों में सत्ता का केंद्रीकरण बरक़रार रख सकते हैं। फिर भी संप्रदाय व्यवस्था का लोकतंत्रीकरण का विरोध करने वाले व्यक्ति इस प्रस्तावित ड्राफ्ट का विरोध इसे 'समय की बर्बादी, इससे कोई परिवर्तन नही होगा, हमें नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने पर ध्यान देना चाहिए, ट्रस्ट का प्रमुख कोईविद्वान होना चाहिए न की कोई निर्वाचित व्यक्ति' आदि बातें कहकर करेंगे। ये लोकतंत्रविरोधी कुतर्क सदियों से चले आ रहे हैं। इनके तर्कों में एक बड़ी कमी यह रही है कि विद्वान व्यक्ति भी सांठ गाँठ से अछूते नही होते, जिन्हे की वे छिपा सकते हैं, तथा उनकी ईमानदारी को साबित करने का कोई तरीका नही है।

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